गोरखपुर से साप्‍ताहिक कालम परिसर, जान बची तो लाखों पाए

बेसिक शिक्षा विभाग के मुखिया रहे बड़े साहब से अधिकारी ही नहीं एक-एक शिक्षक भी वाकिफ हैं। हर दिन नए-नए फरमान व कार्यशैली से वे चर्चा में रहे। प्रदेश के जिस जनपद में उनके दौरे के कार्यक्रम तय होते थे वहां के अधिकारियों व शिक्षकों की परेशानी बढ़ जाती थी।

Satish Chand ShuklaTue, 27 Jul 2021 05:09 PM (IST)
जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय का फाइल फोटो, जागरण।

गोरखपुर, प्रभात पाठक। पिछले दिनों तबादले का ऐसा दौर चला कि कई विभागों के मुखिया से लेकर मातहत तक बदल गए। कुछ स्थानांतरण के बाद लंबी दूरी पर चले गए तो कई आसपास ही रह गए। स्थानांतरण के लिए पंद्रह जुलाई तिथि निर्धारित थी। सभी यही मानकर चल रहे थे कि पंद्रह जुलाई तक बच गए तो फिर इसी जनपद में आराम से नौकरी कट जाएगी। सभी की नजरें स्थानांतरण सूची पर टिकी हुई थीं। सूची जारी होते ही पहले सभी अपना-अपना नाम ढूंढते। नाम होने पर निराश हो जाते। नाम नहीं होने पर खुश हो जाते। जिले में माध्यमिक शिक्षा विभाग के बड़े साहब का कार्यकाल भी पूरा हो चुका है। ऐसे में तबादले को लेकर उनका परेशान होना वाजिब था। हालांकि निर्धारित तिथि तक जब साहब तबादले से बच गए, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इसके बाद वह यही कहते फिर रहे हैं कि जान बची तो लाखों पाए।

जिसका हमें था इंतजार

सूबे में बेसिक शिक्षा विभाग के मुखिया रहे बड़े साहब से अधिकारी ही नहीं एक-एक शिक्षक भी वाकिफ हैं। हर दिन नए-नए फरमान व कार्यशैली से वे चर्चा में रहे। विभाग में अपने अभिनव प्रयोगों से साबित कर चुके हैं कि शिक्षा की नींव मजबूत करनी है, तो दिन-रात मेहनत करनी ही होगी। अभी तक प्रदेश के जिस जनपद में उनके दौरे के कार्यक्रम तय होते थे, वहां के अधिकारियों व शिक्षकों की परेशानी बढ़ जाती थी। पहले ही व्यवस्था चाक-चौबंद कर ली जाती थी कि कहीं कोई गलती न मिले जिससे नौकरी खतरे में पड़े। संयोग से जिले में भी दो बार उनका कार्यक्रम लगा, लेकिन दोनों बार रद हो गया। कार्यक्रम देकर उनके नहीं आने से अब तक राहत की सांस लेने वालों की तो अब जैसे सांस ही रुक गई है। वजह है साहब एक-दो दिन के लिए नहीं बल्कि जिले के मुखिया बनकर आ रहे हैं।

तनाव न देते और न लेते हैं साहब

इन दिनों बेसिक शिक्षा विभाग के कर्मचारी ही नहीं बल्कि शिक्षक भी चैन से नौकरी कर रहे हैं। तबादले की आंधी में पुराने साहब का स्थानांतरण हो गया। नए साहब के आने के बाद मातहतों ने उनका जमकर स्वागत किया। स्वागत से अभिभूत साहब चार्ज लेने के बाद चार दिन के अवकाश पर चले गए। जब वापस लौटे तो बचे हुए शिक्षक व उनके संगठनों के लोगों ने स्वागत का कोरम पूरा किया। विभाग में इस बात की चर्चा है कि पहले वाले की तरह यह सख्त नहीं हैं। एक हफ्ता हो गया, ऐसे में स्कूलों का निरीक्षण न होने से शिक्षक भी चैन से हैं। जिसे मन कर रहा, स्कूल जा रहा है, जिसे नहीं कर रहा, वह हाजिरी बनाकर चला आ रहा है। एक दिन दो शिक्षक आपस में बात कर रहे थे कि पहले वाले से तो यही ठीक हैं, तनाव न देते हैं न लेते हैं।

बिना परीक्षा दिए पास हो गए पप्‍पू

कोरोनाकाल में बोर्ड परीक्षाओं के बिना रिजल्ट निकलना शुरू हो गया है। पहला रिजल्ट आइसीएसई बोर्ड का आया है। रिजल्ट को लेकर परेशान छात्रों की खुशी का ठिकाना नहीं है। हो भी क्यों न, बिना परीक्षा दिए ही अच्छे नंबर जो मिल गए हैं। जो छात्र हाईस्कूल की आफलाइन परीक्षा में शामिल हुए थे और कम अंक हासिल किए थे। वे इंटर में बिना परीक्षा दिए ही हाईस्कूल से दस से पंद्रह फीसद अधिक नंबर पा गए हैं। बोर्ड के नंबरों की बारिश से छात्र ही नहीं उनके अभिभावक भी खुश हैं। नंबरों की इस बारिश में रिजल्ट को लेकर परेशान पप्पू ने भी अच्छे नंबरों से पास होकर गंगा नहा लिया है। पप्पू के घर वालों का कहना है कि जब बिना परीक्षा के ही इतने अच्छे नंबर मिल रहे हैं, तो परीक्षा की क्या जरूरत है। इससे परीक्षा का तनाव भी नहीं रहेगा और नंबर भी खूब मिलेंगे।

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