डीजल की कीमत कम करेगा एमएमएमयूटी का यह शोध, जानें- कैसे ?

एमएमएमयूटी ने भी ईंधन के परंपरागत स्‍त्रोत और पेट्रोल और डीजल का विकल्प तलाशने को लेकर शोध की फेहरिस्‍त में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। विवि के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के असिस्‍टेंट प्रोफेसर ने मक्‍के के तेल से कार्न बायोडीजल बनाया है जो डीजल पर निर्भरता को कम करेगा।

Pradeep SrivastavaMon, 02 Aug 2021 09:02 AM (IST)
मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय। - फाइल फोटो

गोरखपुर, डा. राकेश राय। ईंधन के परंपरागत स्रोत पेट्रोल और डीजल का विकल्प तलाशने को लेकर दुनिया भर में हो रहे शोध की फेहरिस्त में मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। विश्वविद्यालय के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. रविशंकर ने मक्के के तेल से ऐसा कार्न आयन बायोडीजल बनाया है, जिसका उपयोग परंपरागत डीजल पर निर्भरता और उसकी लागत कम करने में किया जा सकता है।

लैब स्तर पर इसकी व्यावहारिक सफलता सुनिश्चित होने के बाद डा. रविशंकर ने अपने शोध के व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए प्रदेश सरकार के साइंस एंड टेक्नालाजी विभाग को प्रस्ताव भेजा है। भारत सरकार के साइंस एंड टेक्नालाजी विभाग को भी वह अपना प्रस्ताव भेजने की तैयारी में हैं।

केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के डा. रविशंकर को मिली है कार्न बायोडीजल बनाने में सफलता

डा. रविशंकर ने कार्न आयल बायोडीजल बनाने के लिए ट्रांसएस्टरीफिकेशन पद्धति का इस्तेमाल किया है। यह पद्धति आयल में मौजूद इस्टर ग्रुप को एल्कोहल ग्रुप में बदलने के लिए अपनाई जाती है। वह बताते हैं कि बायोडीजल के बहुत से गुण परंपरागत डीजल की तरह ही होते हैं। डीजल मूलतः कार्बन और हाइड्रोजन कंपाउंड से बनता है। बायोडीजल मे कार्बन, हाइड्रोजन और आक्सीजन होते हैं। इसमें मौजूद आक्सीजन कार्बन और हाइड्रोजन को जलाने का काम करता है।

ट्रांसएस्टरीफिकेशन पद्धति का इस्तेमाल करते हुए कार्न बायोडीजल भी इसी फार्मूले पर तैयार किया गया है। चूंकि बायोडीजल का उष्मीय मान परंपरागत डीजल की तुलना में कम होता है, इसलिए इसका इस्तेमाल डीजल की मात्रा बढ़ाने में ही किया जा सकता है। उनका दावा है कि उनका यह शोध परंपरागत डीजल पर हमारी निर्भरता को कम करेगा। साथ ही डीजल की लागत भी घटाएगा क्योंकि बायोडीजल की लागत परंपरागत डीजल से 20 फीसद कम होगी। इनका इस शोध ऊर्जा क्षेत्र के प्रतिष्ठित जर्नल एनर्जी सोर्सेज में प्रकाशित हो चुका है।

20 फीसद बायोडीजल के इस्तेमाल में मिल चुकी है सफलता

डा. रविशंकर बताते हैं कि उन्हें परंपरागत डीजल में 20 फीसद कार्न बायोडीजल मिलाकर बतौर ईंधर इस्तेमाल करने में सफलता मिल चुकी है। इस मात्रा 30 फीसद तक पहुंचाने की दिशा में अभी भी कार्य चल रहा है। डीजल में बायोडीजल का इस्तेमाल बढ़ेगा, डीजल की लागत उसी मात्रा में कम होती जाएगी।

पंपिंग सेट पर हो चुका है सफल प्रयोग

डा. रविशंकर ने अपने इस शोध कार्य में मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. प्रशांत सैनी की भी मदद ली है। डा. सैनी की मदद से उन्हें कार्न बायोडीजल मिले डीजल से पंपिंग सेट चलाने में सफलता मिली है। प्रयोग के धरातल पर उनका यह शोध लैब में एक बार नहीं बल्कि तीन बार सफल पाया गया है।

गुणवत्तापूर्ण और समाज के लिए लाभकारी शोध से विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ती है। डा. रविशंकर का शोध भी इस मानक पर खरा उतरता है। उन्हें बधाई देते हुए आश्वस्त करता हूं कि शोध कार्य के दौरान विश्वविद्यालय की ओर से संसाधनों की कमी नहीं होने दी जाएगी। - प्रो. जेपी पांडेय, कुलपति, मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, गोरखपुर।

डाउनलोड करें हमारी नई एप और पायें अपने शहर से जुड़ी हर जरुरी खबर!

रोमांचक गेम्स खेलें और जीतें
एक लाख रुपए तक कैश अभी खेलें

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.