वेस्ट मैटेरियल मैनेजमेंट से निकल रही पर्यावरण संरक्षण की राह, महिला चिकित्सक डा. मधु गुलाटी का अनूठा प्रयोग

निरंतर बढ़ रहा पर्यावरण प्रदूषण का स्तर इसकी तस्दीक है। प्रदूषण की एक बड़ी वजह शहर में अनवरत निकल रहा कूड़ा-कचरा भी है। शहर की वरिष्ठ महिला चिकित्सक डा. मधु गुलाटी ने इसकी चिंता की है। उन्‍होंने घर में ही कूडे-कचरे से खाद बनाना शुरू किया।

Navneet Prakash TripathiWed, 13 Oct 2021 05:50 PM (IST)
अपने घर के बागीचे में खडी डा. मधु गुलाटी। जागरण

गोरखपुर, डा. राकेश राय, गोरखपुर। विकास की अंधी दौड़ में अगर सबसे अधिक किसी को नुकसान पहुंचा है तो वह है पर्यावरण। निरंतर बढ़ रहा पर्यावरण प्रदूषण का स्तर इसकी तस्दीक है। प्रदूषण की एक बड़ी वजह शहर में अनवरत निकल रहा कूड़ा-कचरा भी है। शहर की वरिष्ठ महिला चिकित्सक डा. मधु गुलाटी ने इसकी चिंता की है। उन्होंने आसपास के चाय और खानपान के स्टाल से निकल रहे कूड़े से जैविक खाद बनाकर अपने आवास परिसर में हजारों पौधों की एक मोहक बगिया विकसित की है।

कूडे-कचरे से होने वाली गंदगी से दिला रही हैं निजात

इससे वह न केवल कूड़े-कचरे से होने वाली गंदगी से आसपास के लोगों को बचा रही हैं बल्कि पौधों से पर्यावरण के संरक्षण में भी अपना योगदान सुनिश्चित कर रही हैं। अपने इस प्रयास को उन्होंने खुद तक ही सीमित नहीं रखा है बल्कि अपने अस्पताल में आने वाले मरीजों को भी जोड़ा है। वह आपरेशन के लिए आने वाले मरीजों को पौधा भेंट करते हुए डिस्चार्ज करती हैं। इसके पीछे मकसद मरीजों को पर्यावरण के प्रति उनकी जिम्मेदारी का एहसास कराना होता है।

पढाई के दौरान ही जगा पौधों के साथ जीने का शौक

डा. गुलाटी बताती है कि पौधों के साथ जीने का शौक उन्हें पढ़ाई के दौरान से ही था। ऐसे में अपने घर को गमलों से सजाए रखना उनका शुरू से शौक था। शौक परवान चढ़ा तो उन्होंने आवास परिसर में ही एक छोटी से बगिया विकसित कर ली। लंबे समय तक तो वह बगिया के लिए खाद की जरूरत खरीदकर पूरा करती थीं लेकिन करीब तीन साल पहले उन्हें एक ऐसी आनलाइन कंपनी की जानकारी मिली, जो कूड़ा-कचरा से खाद बनाने का तरीका बताती थी। यही नहीं इसके लिए वह गुड़, कंपोस्ट और एंजाइम जैसी चीजें भी उपलब्ध कराती थी।

घर में ही बनाती हैं कूडे-कचरे और पेडों की पत्तियों से खाद

कंपनी से संपर्क साधकर डा. गुलाटी ने पहले बाल्टी में घरेलू सामानों और पेड़ों से झड़ रही पत्तियों से खाद बनाना शुरू किया। प्रयोग सफल रहा तो ड्रम में खाद बनाना शुरू कर दिया। ड्रम में खाद बनाने के लिए ज्यादा कूड़ा-कचरा की जरूरत थी तो इसके लिए उन्होंने इसके लिए अस्पताल के बाहर अंडा, जूस, चाय आदि का ठेला लगाने वालों से संपर्क साधा और उनसे अपना कूड़ा ड्रम में डालने का अनुरोध किया। जब यह सिलसिला शुरू हुआ तो बगिया की खाद की डिमांड ड्रम में बनने वाली खाद से ही पूरी होने लगी।

जूठे गिलास को बना दिया गमला

वेस्ट मैटेरियल के इस्तेमाल के क्रम मेें डा. गुलाटी ने ठेलों से निकलने वाले जूस, पानी और चाय के जूठे गिलास पड़े दिखे तो उन्होंने गमला बनाकर उनके इस्तेमाल का रास्ता भी निकाल लिया। इन गमलों का इस्तेमाल वह मरीजों को पौधा भेंट देने में करती हैं। उनका यह अनूठा प्रयास वेस्ट मैटेरियल मैनेजमेंट से लेकर पर्यावरण संरक्षण तक का संदेश दे रहा है।

पहले सडक पर फेंक देते थे फलों का छिलका

जूस विक्रेता रफीक अहमद बंदी बताते हैं कि पहले हमें फलों का छिलका इधर-उधर फेंकना पड़ता था, जिसके कारण गंदगी होती थी। जबसे हम इसे डाक्टर मैडम के बताए ड्रम में डालने लगे हैं, खुशी होती है कि बेकार सामान का भी इस्तेमाल हो जा रहा है।

मैडम ने दूर की गंदगी की समस्‍या

चाट व फुलकी विक्रेता सुनील चौधरी बताते हैं कि पहले प्रतिदिन हम ठेले से निकलने वाले खराब सामानों को आसपास ही फेंक देते थे, जिससे गंदगी फैलती थी। खराब सामानों का इस्तेमाल कर मैडम ने गंदगी की समस्या ही दूर कर दी।

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