इंटरनेट मीडिया के संजाल में ब‍च्‍चों को उलझा रहा फोमो, घेर रही उदासी

कोरोना संक्रमण के बाद बड़ी संख्या में बच्चे व युवा फीयर आफ मिसिंग आउट नामक बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। इस बीमारी में दूसरों की जिंदगी में अपनी अहमियत कम या खत्म होने का आभास होता है।

Pradeep SrivastavaMon, 20 Sep 2021 08:02 AM (IST)
कोरोना के बाद बड़ी संख्या में बच्चे फोमो नामक रोग के श‍िकार हो रहे हैं। - प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

गोरखपुर, गजाधर द्विवेदी। Fomo Disease in Children: बड़ी संख्या में बच्चे व युवा फोमो (फीयर आफ मिसिंग आउट) बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। इस बीमारी में दूसरों की जिंदगी में अपनी अहमियत कम या खत्म होने का आभास होता है। इस बीमारी से ग्रसित युवा इंटरनेट मीडिया पर लोगों के बीच अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वहां भी अपेक्षित लाइक व कमेंट न मिलने से कुंठा के शिकार हो रहे हैं और गहरे अवसाद में चले जा रहे हैं। 15 से 20 मरीज जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग के ओपीडी में आ रहे हैं। उनके अभिभावक इस बात से परेशान हैं कि बच्चा अपनी किताब भी नहीं खोलता है और दिन भर फेसबुक पर लाइक व कमेंट देखता रहता है। खाना-पीना भी भूल जाता है। मानसिक रोग विशेषज्ञ इसे फोमो नाम दे रहे हैं।

पढ़ने-लिखने से दूर, खाने-पीने की चिंता नहीं, देखते रहते हैं लाइक-कमेंट

शाहपुर का एक 14 वर्षीय किशोर हाईस्कूल का छात्र है। केवल मोबाइल पर फेसबुक खोलकर देखता रहता है। पढ़ने में उसका मन नहीं लग रहा है। उसे लेकर अभिभावक जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में आए थे। उन्होंने बताया कि देर रात तक फेसबुक पर पोस्ट डालना और लाइक-कमेंट देखते रहना उसकी आदत बन गई है। घर में किसी से बात नहीं करता। किसी से मिलना-जुलना भी छोड़ दिया है। रेती चौक की 13 वर्षीय बच्ची पूरा समय इंटनेट मीडिया पर दे रही है। खाने-पीने की सुध नहीं है। मोबाइल छीन लेने पर रोने लगती है। खाना-पीना छोड़ देती है। फेसबुक पर अपनी फोटो डालना और लाइक-कमेंट देखना ही उसका एकमात्र काम रह गया है। अभिभावक ने बताया कि शुरुआत में हम लोग ध्यान नहीं दिए। लेकिन जब वह हमेशा उदास रहने लगी तो इलाज के लिए ले आए हैं।

कोरोना संक्रमण काल में बढ़ा इंटरनेट मीडिया की तरफ बच्चों का रुझान

मानसिक रोग विशेषज्ञों के अनुसार इंटरनेट मीडिया की तरफ बच्चों का रुझान कोरोना संक्रमण काल में बढ़ा है। जब खेल के मैदान खाली हो गए। अब मोहल्ले के बच्चे भी पार्कों में नहीं जाते हैं। मोहल्लों में होने वाले क्रिकेट लगभग खत्म हैं। चौका-छक्का मारने या अच्छी बालिंग पर जो ताली बजती थी, उसकी कमी महसूस होने लगी। इसलिए वे इंटरनेट मीडिया से तेजी से जुड़ने लगे। यह संभव नहीं है कि जो प्रशंसा या ताली अच्छी बालिंग के लिए मिलती थी, वह फेसबुक पर फोटो डालने से लाइक व कमेंट के रूप में मिल जाए। इससे बच्चों में बड़ी तेजी के साथ निराशा व कुंठा जन्म ले रही है। उदासी आ रही है और अंतत: वे गहरे अवसाद में चले जा रहे हैं।

मनुष्य भीड़ में भी अपनी एक अलग पहचान चाहता है। मुख्य रूप से नारसिज्म व हिस्टोरियोनिक दो तरह का व्यक्तित्व होता है। नारसिज्म व्यक्तित्व का व्यक्ति लोगों की हमेशा तवज्जाे चाहता है और हिस्टोरियोनिक व्यक्तित्व खुद से बहुत प्रेम करता है। दोनों तरह के व्यक्ति दूसरों की जिंदगी में अपना महत्व ढूढ़ते हैं, यह जब घर या पड़ाेस में नहीं मिलता है तो वे इंटरनेट मीडिया पर इसे खोजने की कोशिश करते हैं। वहां जब वे देखते हैं कि दूसरों को लाइक-कमेंट बहुत ज्यादा मिल रहा है और उन्हें कम, तो वे कुंठा के शिकार होते हैं। धीरे-धीरे उदासी घेरने लगती है और अंतत: गहरे अवसाद में चले जाते हैं। - डा. अमित कुमार शाही, मानसिक रोग विशेषज्ञ, जिला अस्पताल।

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