विषम परिस्थितियों में भी दायित्व का किया निवर्हन

कोविड की पहली लहर रही हो या दूसरी खंड विकास अधिकारी इटवा सतीश कुमार पांडेय अपने दायित्वों को निभाते रहे। इटवा के अलावा खुनियांव ब्लाक की जिम्मेदारी भी इन्हीं के ऊपर थी। परिवार से दूर बिना अवकाश लिए अपने कार्यों को बखूबी किया। प्रतिदिन कर्मचारियों के साथ बैठक करते किसी गांव में लोगों को जागरूक करने के लिए निकल जाते ।

JagranSun, 15 Aug 2021 06:30 AM (IST)
विषम परिस्थितियों में भी दायित्व का किया निवर्हन

सिद्धार्थनगर : कोविड की पहली लहर रही हो या दूसरी खंड विकास अधिकारी इटवा सतीश कुमार पांडेय अपने दायित्वों को निभाते रहे। इटवा के अलावा खुनियांव ब्लाक की जिम्मेदारी भी इन्हीं के ऊपर थी। परिवार से दूर बिना अवकाश लिए अपने कार्यों को बखूबी किया। प्रतिदिन कर्मचारियों के साथ बैठक करते किसी गांव में लोगों को जागरूक करने के लिए निकल जाते । कल क्या करना है, इसका खाका रात में ही तैयार कर लेते थे। बैठक के माध्यम से निगरानी समिति को सक्रिय करने के अलावा ग्रामीणों को भी कोविड के प्रति सतर्क करते। किसको राशन नहीं मिला, उसे दिलाने का कार्य भी बखूबी किया। स्वयं सहायता समूह के जरिये पर्याप्त मास्क का वितरण, प्रवासियों कामगारों को मनरेगा में रोजगार देने की बात रही हो अथवा कामगारों के खाते में सरकार की ओर से भेजे जाने वाले एक हजार रुपये की सहायता हो, सभी काम बखूबी निभाया। विभाग के अलावा प्रशासनिक कार्यों में हाथ बंटाने में हमेशा आगे रहे।

कोरोना संक्रमण के चलते हर कोई डरा सहमा हुआ था। परंतु खंड विकास अधिकारी की सुबह होती तो कैसे और कौन-कौन कार्य कराए जाने हैं, इसी में जुट जाते। कभी ग्राम सचिवों से संवाद, कभी सफाई कर्मचारियों की बैठक तो कभी रोजगार सेवकों के साथ मीटिग। गांव में बेहतर सफाई व्यवस्था के साथ जगह-जगह सैनिटाइज्ड कराने के निर्देश के साथ इसकी निगरानी भी करते दिखाई दिए। दोनों ब्लाक के 294 गांवों की जिम्मेदारी संभालना आसान नहीं था, परंतु जिस तरह इन्होंने जज्बा दिखाया, उसकी हर किसी ने प्रशंसा की। कोरोना के चलते प्रवासियों मजदूरों की पलायन शहरों की तरफ हुआ तो उन्हें रोजगार कैसे मिली इसकी योजना तैयार कराई। यही वजह रही कि इटवा में 17 हजार तो खुनियांव ब्लाक क्षेत्र में 18900 मनरेगा मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराया। सतीश कुमार पांडेय उस पल को याद कर सिहर जाते हैं, बताते है कि कोरोना संक्रमण का दौर बहुत ही भयावह रहा। परंतु लक्ष्य सिर्फ एक ही था कि संकट की घड़ी में जितनी संभव मदद हो सके, करते रहें। कब दिन होता था कब रात, पता ही नहीं चलता था। ब्लाक कर्मियों का भरपूर सहयोग मिला। जिसके चलते कोविड से लड़ाई बेहतर तरीके से लड़ी गई।

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