गौनर में 46 लोगों की माैत के बाद संघ ने संभाली जिम्‍मेदारी, तब गांव छोड़कर भागा कोरोना Gorakhpur News

गांव को कोरोना मुक्त कराने की जिम्मेदारी संघ ने अपने सिर ले ली। संघ ने 26 स्वयंसेवकों की टीम बनाई। इलाज व बचाव के संसाधनों थर्मल स्कैनर सैनिटाइजर पीपीई किट मास्क हैंड ग्लब्स दवा किट काढ़ा आदि के साथ संघ के पूर्ण गणवेश में गांव में डेरा डाल दिया।

Satish Chand ShuklaMon, 14 Jun 2021 01:31 PM (IST)
गौनर गांव में लोगों को जागरूक करने के लिए गणवेश में निकले संघ के स्वयंसेवक, जागरण।

गोरखपुर, जेएनएन। कभी कोरोना के चलते त्राहि-त्राहि करने वाले सरदारनगर ब्लाक के गौनर गांव में आज न तो कोरोना संक्रमण है और न ही इसकी कोई गुंजाइश। डेढ़ महीने में 46 लोगों का श्राद्ध कर्म कर चुके ग्रामीण अगर आज सुकून की सांस ले रहे हैं तो उसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दो दर्जन से अधिक उन स्वयंसेवकों की कड़ी मेहनत है, जिन्होंने गांव को कोरोना मुक्त बनाया। तीसरी फेज से लोग सुरक्षित रहें, इसके लिए स्वयंसेवक अब उन्हें टीका से आच्‍छादित करवाने में लगे हुए हैं।

इस तरह से संघ ने ली जिम्‍मेदारी

18 टोले और 15 हजार से अधिक आबादी वाले इस गांव को कोरोना मुक्त कराने में लगे स्वयंसेवकों की अगुवाई करने वाले सेवा भारती के सामाजिक आयाम के संपर्क प्रमुख योगेश पांडेय बताते हैं कि चूंकि गौनर उनका गांव है, इसलिए वह 12 अप्रैल को यहां आए थे। यहां पता चला कि महज 10 दिन में गांव के डेढ़ दर्जन लोग काल-कवलित हो चुके हैं। योगेश ने इसकी सूचना प्रांत प्रचारक सुभाष और क्षेत्र सेवा प्रमुख रामनवल की दी। इसके बाद गांव को कोरोना मुक्त कराने की जिम्मेदारी संघ ने अपने सिर ले ली। संघ ने 26 स्वयंसेवकों की टीम बनाई जिसने इलाज व बचाव के संसाधनों (थर्मल स्कैनर, सैनिटाइजर, पीपीई किट, मास्क, हैंड ग्लब्स, दवा किट, काढ़ा आदि) के साथ संघ के पूर्ण गणवेश में गांव में डेरा डाल दिया।

डेढ़ माह की कड़ी मेहनत के बाद मिली सफलता

प्रशासन को जानकारी मिली तो अधिकारियों की गाडिय़ां भी गांव में दौडऩे लगी। पूरे गांव की कोविड जांच कराकर दवाओं और जरूरी सामानों को घर-घर पहुंचाया। गंभीर रूप से बीमार ग्रामीणों को अस्पताल पहुंचाया। गांव के सैनिटाइजेशन का कार्य निरंतर करते रहे। नतीजा रहा कि डेढ़ महीने मेें गांव को कोरोना से मुक्त कराने में उन्हें सफलता मिल गई।

घंट में लिखे जाने लगे थे मरने वाले के नाम

स्वयंसेवक योगेश बताते हैं कि एक समय ऐसा था कि गांव के परंपरागत श्राद्ध स्थान पर मौजूद पीपल के पेड़ पर एक साथ इतने घंट बंध गए थे कि यह पहचान मुश्किल हो गई थी कि कौन सा घंट किस दिवंगत के लिए लगा है। घंट की पहचान के लिए घड़े के ऊपर लोगों को नाम की पर्ची लगानी पड़ती थी।

गांव की सीमा पर डाल दिया डेरा

आसपास के गांवों में संक्रमण न फैले इसके लिए स्वयंसेवकों ने गांव की सीमा पर डेरा डाल दिया। गांव में आने-जाने वालों में जो भी संक्रमित मिला, उसे गांव से बाहर नहीं जाने दिया। उसकी जरूरत को गांव में ही पूरा कर दिया। आधा दर्जन पड़ोसी गांवों में भी जागरूकता और बचाव के लिए अभियान चलाया।

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