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लाकडाउन के एक साल : प्रवासियों के लिए वरदान बनकर चली थी श्रमिक स्पेशल Gorakhpur News

रेलवे स्टेशन पर आए लोगों की जांच की गई। फाइल फोटो

24 मार्च 2020 को पूरे देश में लाकडाउन शुरू होने से एक दिन पहले देशभर की रेल सेवाएं बंद हो गईं। रेलवे के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि 39 दिनों तक एक भी यात्री ट्रेनें नहीं चलीं।

Rahul SrivastavaMon, 29 Mar 2021 01:10 PM (IST)

गोरखपुर, जेएनएन : 24 मार्च, 2020 को पूरे देश में लाकडाउन शुरू होने से एक दिन पहले देशभर की रेल सेवाएं बंद हो गईं। यात्री ट्रेनों के साथ आम जनजीवन भी ठप हो गया। जो जहां था, वहीं ठहर गया। रेलवे के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि 39 दिनों तक एक भी यात्री ट्रेनें नहीं चलीं। जैसे-तैसे घर पहुंचने के लिए सड़क पर आ गए प्रवासियों के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनें वरदान बन गईं। रेलवे ने लाखों प्रवासियों को घर तो पहुंचाया ही मालगाड़‍ियों से राहत सामग्री भी यहां-वहां पहुंचाई।

जब सड़क पर आ गए थे कामगार

लाकडाउन में मुंबई, गुजरात, अहमदाबाद, बेंगलुरु, दिल्ली और पंजाब आदि शहरों की कंपनियों में जब ताले लटक गए तो पूर्वांचल के प्रवासी सड़क पर आ गए। कंपनी मालिकों ने भी अपने हाथ खींच लिए। कामगार सड़क पर आ गए। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि कहां जाएं, क्या करें। सैकड़ों की संख्या में लोग पैदल ही चल दिए। कुछ पंजाब से साइकिल से तो कई मोटरसाइकिल से गुजरात के लिए घर के लिए निकल पड़े। देशभर के श्रमिकों के बीच अफरातफरी का माहौल बन गया था। रोजी के साथ रोटी भी छिन गई। बाहर प्रवासी परेशान थे, घर पर स्वजन बेचैन।

रेलवे ने दिखाई राह

मुश्किल की इस घड़ी में रेलवे ने राह दिखाई। तब श्रमिक स्पेशल ट्रेनें देवदूत बनकर प्रकट हुई। पूर्वोत्तर रेलवे में 911 श्रमिक ट्रेनों से कुल 9.38 लाख लोग सकुशल घर पहुंचे। 313 श्रमिक ट्रेनों ने सिर्फ गोरखपुर में ही 3.1 लाख लोगों को उताकर उनके चेहरे और परिवार में खुशियां लौटाईं। रेलवे ने रास्ते में खानपान की व्यवस्था भी उपलब्ध कराई। एक जून से स्पेशल के रूप में एक्सप्रेस ट्रेनों के चल जाने से आवागमन आसान हो गया। यात्री ट्रेनों के साथ धीरे-धीरे आम जन-जीवन पर पटरी पर आने लगी। अब तो मेमू और डेमू ट्रेनें भी चलने लगी हैं। जनरल टिकटों के काउंटर खुल जाने से छोटे स्टेशनों पर भी चहल-पहल बढ़ गई है।

रेलकर्मियों ने दिखाई आत्मनिर्भर बनने की राह, नहीं थमा विकास का पहिया

लाकडाउन में रेलवे के लोको पायलटों, गार्डों, चल टिकट परीक्षकों, सुरक्षाकर्मियों, स्वास्थ्यकर्मियों और सफाईकर्मियों ही नहीं इंजीनियरों और कर्मचारियों ने भी अपने आत्मबल का परिचय दिया। उन्होंने आत्म निर्भर बनने की राह दिखाई। जब बाजार में मास्क नहीं मिल रहे थे, उस समय यांत्रिक कारखाना में बड़ी मात्रा में मास्क, सैनिटाइजर, फेस सील्ड, पर्सनल प्रोटेक्शन इक्यूपमेंट (पीपीई किट) तैयार होने लगे। ट्रैक मेंटेनर रेल लाइनों को दुरुस्त करने में जुट गए। ट्रेनों के पहिये थमे रहे, लेकिन विकास का पहिया आगे बढ़ता रहा। कोरोना काल में भी पूर्वोत्तर रेलवे प्रशासन ने नई कीर्तिमान गढ़े। चाहें वह यात्री सुविधाएं हों, निर्माण कार्य हों या रेल संचालन का सुदृढ़ीकरण।

पूर्वोत्तर रेलवे ने सुदृढ़ कर ली अपनी सुरक्षा व्यवस्था

पूर्वोत्तर रेलवे प्रशासन ने कोरोना काल में न सिर्फ अपने विकास की गति को बनाए रखा, बल्कि संरक्षा के साथ सुरक्षा को भी सुदृढ़ कर लिया। रेलवे सुरक्षा विशेष बल रजही कैंप से प्रशिक्षण प्राप्त करने वाली 550 महिला प्रशिक्षु रेलवे के साथ देश सेवा में जुट गई हैं। रेलवे सुरक्षा प्रशिक्षण केंद्र कौवाबाग से भी 350 महिला प्रशिक्षु प्रशिक्षण प्राप्त कर भारतीय रेलवे और यात्रियों की सुरक्षा कर रही हैं। इन महिला प्रशिक्षुओं से महिला यात्रियों की सुरक्षा और बढ़ गई है।

 प्रवासियों को सुरक्षित घर तक ले गईं रोडवेज की बसें

लाकडाउन में बसें भी डिपो परिसर में खड़ी हो गई थी, लेकिन गोरखपुर में प्रवासियों के कदम पड़ते ही बसें भी फर्राटा भरने लगीं। दूसरे राज्यों से पूर्वोत्तर रेलवे के गोरखपुर सहित विभिन्न स्टेशनों पर उतरे प्रवासियों को रोडवेज की बसों ने सुरक्षित घर तक पहुंचाया। प्रवासियों को बस का किराया नहीं देना पड़ा। रेलवे स्टेशन बस डिपो बन गया था। प्रवासियों को घर तक पहुंचाने में चालकों और परिचालकों ने अदम्य साहस का परिचय दिया। वे जान जोखिम में डालकर लोगों को स्वजन से मिलाते रहे। अब तो सभी बसें नियमित रूप से चलने लगी हैं। जन जीवन सामान्य हो गया है।

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