सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास समेटे है जिगिना धाम

इटवा तहसील मुख्यालय से करीब 13 किमी दूरी पर उत्तरी छोर पर स्थित जिगिना धाम का प्राचीन मंदिर कई सभ्यता एवं संस्कृतियों को समेटे है। यही नहीं पूर्वांचल का यह एक ऐसा अनूठा मंदिर है जहां पहुंचकर कोई व्यक्ति न हिदू रह जाता है और न ही मुसलमान।

JagranMon, 06 Dec 2021 04:44 PM (IST)
सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास समेटे है जिगिना धाम

सिद्धार्थनगर : इटवा तहसील मुख्यालय से करीब 13 किमी दूरी पर उत्तरी छोर पर स्थित जिगिना धाम का प्राचीन मंदिर कई सभ्यता एवं संस्कृतियों को समेटे है। यही नहीं पूर्वांचल का यह एक ऐसा अनूठा मंदिर है, जहां पहुंचकर कोई व्यक्ति न हिदू रह जाता है और न ही मुसलमान। हवन से लेकर अन्य सामग्रियों को दोनों वर्गों के लोग मिलजुल कर इकट्ठा करते हैं। मंगलवार के यहां मेला लगेगा।

इतिहास पर नजर डालें तो जिगिना धाम मंदिर को बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने 84 गांव दिए थे, जिसके दस्तावेज आज भी सुरक्षित हैं। जिगिना धाम में लक्ष्मी नारायण चर्तुभुजी भगवान का एक प्राचीन मंदिर है। जहां हर वर्ष अगहन के शुक्ल पक्ष तिथि पंचमी को राम-विवाह जैसे धार्मिक आयोजन होते हैं। इस दिन एक सप्ताह तक चलने वाले विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें शामिल होने के लिए नेपाल से लेकर देश के दूसरे बड़े शहरों से श्रद्धालु आते हैं। दंत कथाओं के अनुसार इस मंदिर को वशिष्ठ जी ने भारद्वाज ऋषि को दे दिया था। जिसका बाद में नाम बदलकर जिगिना धाम हो गया।

मंदिर के महंत बाबा विजय दास के मुताबिक तेरहवीं सदी में बादशाह अलाउद्दीन के शासन काल में यहां के महंत बाबा विष्णु दत्त थे। कहते हैं कि बाबा विष्णु दत्त से भगवान लक्ष्मी नारायण की मूर्ति बातचीत भी करती थी। जिसको जानकारी होने पर बादशाह अलाउद्दीन अपनी सेना के साथ यहां आए। मंदिर की अलौकिक शक्ति से प्रभावित होकर उन्होंने मंदिर के संचालन के लिए 84 बीघा की चहारदीवारी व चौरासी गांव देने के अलावा प्रत्येक वर्ष 365 स्वर्णमुद्रा मंदिर को देने का आदेश लिखकर दिया। जिसका रिकार्ड बस्ती मंडल के रिकार्ड रूम में पत्रावली संख्या चार में आज भी मौजूद है।

बदलते जमाने में मंदिर के पास मात्र एक बाग और कुछ जमीनें शेष बची हैं। बीते लगभग पांच वर्ष पूर्व यहां तालाब की खोदाई में एक बेशकीमती अष्टधातु की मूर्ति भी मिली थी जो आज भी मंदिर में सुरक्षित है लोग उस मूर्ति के दर्शन भी करते है। इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए शासन स्तर से भी कोई कारगर पहल नहीं हो पा रही है।

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