Indo-Pak War 1971: ग्रेनेड व गोलियां लगने के बावजूद ढाका में कराया था प्रवेश

भारत-पाक युद्ध 1971 की शौर्य गाथा लिखने से पूर्व उसी साल गोरखा राइफल्स के जवान तुल बहादुर थापा ने दाहिने पैर में ग्रेनेट और दाहिने हाथ में दो गोलियां लगने के बावजदू ईएमई कोर को पूर्वी पाकिस्तान अब बांग्लादेश के ढाका में प्रवेश कराया था।

Pradeep SrivastavaSun, 21 Nov 2021 12:46 PM (IST)
गोरखा राइफल्स के जवान तुल बहादुर थापा। - जागरण

गोरखपुर, जागरण संवाददाता। भारतीय सेना के रणबांकुरों ने किस तरह से अपनी जान की परवाह किए बगैर मातृभूमि को सुरक्षित रखा है, उसे जानकर हर किसी को गर्व महसूस होता है। 4/5 गोरखा राइफल्स के राइफल मैन तुल बहादुर थापा की शौर्य की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। भारत-पाक युद्ध 1971 की शौर्य गाथा लिखने से पूर्व उसी साल गोरखा राइफल्स के जवान तुल बहादुर थापा ने दाहिने पैर में ग्रेनेट और दाहिने हाथ में दो गोलियां लगने के बावजदू ईएमई कोर को पूर्वी पाकिस्तान अब बांग्लादेश के ढाका में प्रवेश कराया था।

हवाई लैंड‍िंग कर 35 पाकिस्तानी सैनिकों को खुखरी से काटकर उतार था मौत के घाट

हवाई लैंड‍िंग कर गोरखा राइफल्स के जवानों ने 35 सैनिकों को खुखरी से काटकर यह उपलब्धि हासिल की थी। महराजगंज लिेके नौतनवां निवासी राइफलमैन तुल बहादुर थापा (मूल निवासी नेपाल) की इस शौर्य गाथा के चश्मदीद ईएमई कोर के कैप्टन रामानंद साहनी निवासी बांसगांव भी शनिवार को मिलिट्री स्टेशन कूड़ाघाट में मौजूद थे। उन्होंने बताया कि किस तरह से उनकी ईएमई कोर को पाकिस्तानी सैनिक आगे बढऩे नहीं दे रहे थे। उन पर बार-बार हमला कर रहे थे। उन्हें चौबीस घंटे से अधिक समय तक नदी के किनारे रोके रखा था। ऐसे में 4/5 गोरखा राइफल्स के जवानों की हवाई लैंड‍िंंग नदी के आसपास कराई गयी। घाटी में मौजूद सभी 35 पाकिस्तानी सैनिकों का गला खुखरी से काटकर ईएमई कोर को ढाका में प्रवेश कराया। कैप्टन रामानंद ने कहा कि हमारे कोर की जिम्मेदारी पुल बनाने के साथ ही वार के दौरान मारे गए लोगों के शवों का अंतिम संस्कार करने की थी। हम एक दिन में 50 से 100 लोगों का अंतिम संस्कार उसी इलाके में करते थे। तुल बहादुर थापा पांच साल, 26 दिन देश की सेवा करने के बाद वर्तमान में परिवार के साथ नौतनवा में रहते हैं। शनिवार को उनके साथ ही कैप्टन रामानंद व अन्य को भी सम्मानित किया गया।

पहले विश्व युद्ध के बाद बना था गोरखा वार मेमोरियल

कूड़ाघाट में गोरखावार मेमोरियल पहले विश्व युद्ध के बाद 1925 में बना था इस मेमोरियल को तत्कालीन फील्ड मार्शल सर विलियम विर्डवुड ने विश्व युद्ध में शहीद हुए 20 हजार गोरखा सैनिकों की याद में स्थापित किया गया था। शहीद सैनिकों को दो हजार से अधिक अवार्ड भी हासिल हुए थे। बताया जाता है कि यह देश का पहला वार मेमोरियल स्थापित किया गया था। ऐतिहासिक रूप से इसका विशेष महत्व है। लेफ्टिनेंट जनरल एस.मोहन, एसएम, वीएसएम ने इसके स्थापित होने की जानकारी देते हुए बताया कि गोरखपुर और बस्ती मंडल के सात जिलों में 35 हजार पूर्व सैनिक और एक लाख से अधिक उनके परिवार हैं। उन्होंने कहा कि 1925 से लेकर 1971 तक जो भी लड़ाइयां हुईं और उसमें जितने भी वेटरन्स ने भाग लिया और शहीद हुए उन्हीं की याद का यह मेमोरियल प्रतिनिधित्व करता है।

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