नमो देव्यै : विषम परिस्थितियों में भी नहीं डगमगाए कदम, शांतचित्त रहकर मरीजों की सेवा में जुटी रहीं डा. मिनाली

बीआरडी मेडिकल कालेज के एनेस्थीसिया विभाग की रेजीडेंट डाक्टर मिनाली गुप्ता भगवती के इसी स्वरूप को चित्रित करती हैं। कोविड संक्रमण की दूसरी लहर में चारो तरफ आपाधापी व अशांति थी। वातावरण प्रतिकूल था। ऐसे में वह धवल वस्त्रों में शांतचित्त रहकर मरीजों की सेवा में जुटी रहीं।

Navneet Prakash TripathiMon, 11 Oct 2021 06:15 AM (IST)
शांतचित्त रहकर मरीजों की सेवा में जुटी रहीं डा. मिनाली। जागरण

गोरखपुर, गजाधर द्विवेदी। भगवती का आठवां स्वरूप है मां महागौरी। एक ऐसी स्त्री जो विपरीत परिस्थितियों में न तो डगमगाती है और न ही घबराती है। बल्कि लोक कल्याण की दिशा में अनवरत उसके कदम बढ़ते रहते हैं। बीआरडी मेडिकल कालेज के एनेस्थीसिया विभाग की रेजीडेंट डाक्टर मिनाली गुप्ता, भगवती के इसी स्वरूप को चित्रित करती हैं। कोविड संक्रमण की दूसरी लहर में चारो तरफ आपाधापी व अशांति थी। वातावरण प्रतिकूल था। ऐसे में वह धवल वस्त्रों में शांतचित्त रहकर मरीजों की सेवा में जुटी रहीं।

लेवल थ्री अस्‍पता के आइसीयू में करती रहीं मरीजों की सेवा

कोरोना की दूसरी लहर इतनी भयावह थी कि हवा में भी संक्रमण की आशंका से लोग घरों में दुबक गए थे। एकमात्र लेवल थ्री अस्पताल बाबा राघव दास मेडिकल कालेज में पांच सौ बेड फुल हो गए थे। 24 घंटे में 25-30 लोगों की मौत हो रही थी। अनेक डाक्टर कोरोना वार्ड व आइसीयू से अपनी ड्यूटी हटवाने में जुटे थे। कम लोग ही अंदर जाने का साहस कर पा रहे थे। ऐसे में डा. मिनाली गुप्ता ने कोविड वार्ड के आइसीयू में पूरे साहस व धैर्य के साथ मोर्चा संभाला और मरीजों की सेवा करती रहीं।

मां की तरह की देखभाल

जब संक्रमितों से अपने घर-परिवार के लोग दूर भाग रहे थे, हालांकि यह जरूरी भी था। ऐसे में डा. मिनाली के सामने मरीजों से दूर जाने का कोई उपाय नहीं था। आइसीयू में ज्यादातर मरीज ऐसे थे जो अपने हाथ से दवा भी नहीं खा सकते थे। मां की तरह डा. मिनाली ने उनकी देखभाल की। उनका आत्मबल बढ़ाया। क्योंकि वहां केवल मरीज थे, उनके परिवार का कोई सदस्य नहीं था। मरीजों को दवा व इलाज के साथ यह बोध कराना जरूरी था कि वे अपने परिवार के बीच में ही हैं। उन्हें किसी तरह की दिक्कत नहीं होने पाएगी। डा. मिनाली ने यह दायित्व भी निभाया।

सेवा करते हुए हो गईं बीमार

डा. मिनाली पूरे मन-प्राण से मरीजों की सेवा कर रही थीं। हर मरीज को संक्रमण से बाहर लाना उनकी प्राथमिकता थी। मरीज निराश व हताश न होने पाएं, यह जिम्मेदारी भी उन्हें निभानी थी। अपनेपन बोध भी कराना था। बिना नजदीक गए यह संभव नहीं था। ऐसे में वह खुद संक्रमण का शिकार हो गईं और गंभीर रूप से बीमार पड़ीं। उनका आक्सीजन लेवल 82 फीसद व सीटी वैल्यू 15/25 हो गया था अर्थात उनका फेफड़ा 60 फीसद संक्रमित हो गया था। जहां वह मरीजों का इलाज कर रही थीं, उसी आइसीयू में उन्हें भर्ती होना पड़ा। एक माह बाद वह स्वस्थ हुईं। कुछ दिन के बाद पुन: उन्होंने अपनी ड्यूटी संभाल ली।

अष्टम मां महागौरी

धवल स्वरूप में मां का यह अवतार विषमतम परिस्थितियों में न डगमगाने और सही दिशा में चलायमान रहने की प्रेरणा देता है। जब सब तरफ आपाधापी हो, अशांति हो, वातावरण प्रतिकूल हो, तब भी शांतचित्त रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करने वाली स्त्री मां के इसी स्वरूप के दर्शन कराती है।

संक्रमण काल में बचने का नहीं लडने का संकल्‍प लिया

डा. मिनाली गुप्‍ता कहती हैं कि दूसरी लहर बहुत भयानक थी। लगता था कि पास से गुजरने वाले हर व्यक्ति में संक्रमण है। ऐसे समय में एक डाक्टर के रूप में मैंने बचने का नहीं, लडऩे का विकल्प चुना। यह मेरा दायित्व है। इसी दिन के लिए तो मेरी सारी ट्रेनिंग हुई है। परीक्षा की घड़ी आई तो मैं कैसे भाग सकती थी। मैं खुश हूं कि मैंने परीक्षा दी और पूरी तरह सफल रही। इसमें मेरे पति डा. अवनीश ने भरपूर सहयोग किया। वह हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाते रहे।

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