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50 रुपये में मौत के ढेर पर बैठकर काम कर रहे थे मासूम

हसीन शाह, मोदीनगर : फैक्ट्री संचालक पैसे के लालच में मासूम बच्चों से जान से खेल रहा था। बच्चे मौत के ढेर पर बैठकर विस्फोटक सामग्री से फुलझड़ियां बना रहे थे। एक दिन में बच्चों को 50 से 100 रुपये दिए जाते थे। आरोपित के पास दस से 14 साल के एक दर्जन से ज्यादा बच्चे काम करते थे। बच्चों को यह जानकारी तक नहीं थी कि जिस स्थान पर वह काम कर रहे है, यदि उस जगह पर आग की एक चिगारी लग जाए तो मंजर भयावह हो सकता है।

फैक्ट्री मालिक को बच्चों और महिलाओं को काम करने के बदले में कम पैसे देने पड़ते थे। लिहाजा आरोपित ने एक दर्जन से ज्यादा बच्चों से काम करा रहा था। कई महिलाएं अपनी बच्चों के साथ फैक्ट्री में काम करने जाती थी। हालांकि फैक्ट्री में जिस जगह विस्फोट हुआ, बच्चे उसके बराबर वाले दूसरे मकान में काम कर रहे थे। विस्फोट होने पर इस स्थान पर ज्यादा नुकसान नहीं हुआ। मगर उस स्थान पर भी विस्फोट से धुंआ फैल गया और आग लग गई थी। बच्चे भी अपनी जान बचाकर भागने लगे। घटना स्थल इधर-उधर पड़ी बच्चों की चप्पलें बयां कर रही थी घटना के वक्त बच्चों ने भागने के लिए बहुत संघर्ष किया होगा। बच्चों से 12-14 घंटे तक काम कराया जा रहा था। कोरोना काल से पहले आर्थिक रूप से कमजोर लोग अपने बच्चों को स्कूल से आने के बाद फैक्ट्री में काम करने भेज देते थे। फैक्ट्री मालिक आस-पास के घरों में भी विस्फोटक सामग्री भेजकर बच्चों से फुलझड़ियां बनवाता था।

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रात में भी चलती थी फैक्ट्री

स्थानीय लोगों ने बताया कि दिन और रात में फैक्ट्री चलती थी। ज्यादातर महिलाएं और बच्चों से रात में ही काम कराया जाता था। दिन में आरोपित को छापेमारी का डर रहता था, मगर रात में आरोपित बेखौफ फैक्ट्री चलाता था। फैक्ट्री संचालक इतना रसूखदार है कि यदि कोई छापेमारी करने भी आता तो गांव में प्रवेश करने से पहले ही उसे पता चल जात था। जिसके बाद वह फैक्ट्री को बंद कर निकल जाता था।

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फैक्ट्री में बड़ी संख्या में बच्चों से काम कराया जा रहा था। घटना के वक्त बच्चे दूसरी तरफ काम कर रहे थे। जिस कारण वह बच गए। मैंने महिलाओं के साथ बच्चों को जान बचाकर भागते हुए देखा है।

मोनू, ग्रामीण

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घटना के वक्त बच्चे भी काम कर रहे थे। बच्चों को 50 से 100 रुपये प्रतिदिन दिए जाते थे। मोदीनगर के विजयनगर से भी यहां बच्चे काम करने आते थे। गांव में कई घरों में विस्फोट सामग्री भिजवाकर बच्चों से काम कराया जाता था।

- मनीष, ग्रामीण

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