बेसहारा बच्चों को अभी तक नहीं मिल सका आशियाना

बेसहारा बच्चों को अभी तक नहीं मिल सका आशियाना
Publish Date:Thu, 29 Oct 2020 10:49 PM (IST) Author: Jagran

संवाद सहयोगी, कायमगंज : पिता मुकदमे में जेल चला गया और मां भी बच्चों को छोड़कर दूसरी जगह चली गई। सबसे बड़ी 12 वर्ष की बेटी दो छोटे भाइयों के साथ बेसहारा हो गई। खंडहर जैसे घर में रहने वाले इन बच्चों को करीब दो वर्ष पहले जिला प्रशासन से भरोसा मिला था कि उनके भरण पोषण व आशियाने की व्यवस्था होगी, लेकिन प्रशासन अपना वादा भूल गया। बेसहारा बच्चे आज भी खंडहर जैसे घर में किसी तरह जिदगी की गाड़ी खींच रहे हैं।

मदारपुर की बालिका सोनम की कहानी बड़ी मार्मिक है। पिता महेश राजपूत पर हत्या का मुकदमा लगा, जिसमें ढाई वर्ष पहले वह जेल चला गया। पत्नी सावित्री कुछ दिन तक तो तीन बेटों व एक बेटी के साथ रही। आर्थिक तंगी व अन्य दिक्कतों के चलते वह भी दो वर्ष पहले अपने बच्चों को छोड़ कर किसी के साथ चली गई। तभी से बेसहारा हुए बच्चे सोनम, अनिकेत, सरजू व हिमांशु जैसे तैसे गुजर बसर करते रहे। कुछ दिन बाद मां ने तीनों बेटों को प्रेमी की मदद से बुलवा लिया। अकेली बची सोनम रोती बिलखती रह गई। तभी जागरण ने उसकी खबर प्रकाशित की। जिसके प्रभाव से तत्कालीन डीएम मोनिका रानी के आदेश पर बेसहारा हुई बालिका के आंसू पोछने कई सरकारी विभागों का अमला गांव पहुंच गया था। तत्कालीन तहसीलदार ने बालिका के लिए कोटेदार से खाद्यान्न का इंतजाम कराया। अधिकारियों ने अपनी ओर से आर्थिक सहायता भी दी। बालिका के टूटे फूटे मकान को देख तहसीलदार ने प्रधान व बीडीओ से बात कर आवास निर्माण का भरोसा दिया। पुलिस की सक्रियता बढ़ने से मां ने दो बेटे सरजू व हिमांशु को गांव मदारपुर भिजवा दिया। तब से सोनम, सरजू व हिमांशु एक दूसरे का सहारा बनकर गांव के टूटे फूटे घर में रह रहे हैं। पिता की पांच बीघा खेती को गांव में रहने वाले चाचा अमर सिंह देखते हैं। फसल का थोड़ा बहुत हिस्सा मिल जाता है।

बच्चों की होगी मदद

खंड विकास अधिकारी राहुल शंकर राय ने बताया कि वह हाल ही में कायमगंज आए हैं। यह प्रकरण उनके संज्ञान में नहीं है, लेकिन जैसा बताया गया कि बच्चे बेसहारा हैं, उन्हें आवास, शौचालय निर्माण के अलावा अन्य यथासंभव मदद की जाएगी। बच्चे बालिग हों तो मनरेगा में जॉब भी दिलाया जा सकता है।

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