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जहां खून-पसीना बहाया वही शहर बेगाना हो गया

संवादसूत्र, बकेवर : अपना घर छोड़कर जिस शहर में रोजी रोटी कमाने गए और जहां पर खून पसीना बहा रहे थे, वही शहर मौका पड़ने पर बेगाना हो गया। कोरोना महामारी के दौरान शहर के लोगों ने हमें मजदूर समझकर किनारा कर लिया। प्रवासी को यह दर्द रह रहकर सता रहा है। दूर-दराज के शहरों में लॉकडाउन का दंश झेलकर वापस आए लोगों को मजदूरी का पेशा अब अपने गांव में भाने लगा है। अब यह काम चाहे फसल की गोड़ाई करने का हो या फिर मजदूरी ही क्यों न हो उन्हें इससे कोई गुरेज नहीं है। प्रवास से लौटे युवाओं ने अब गांव के काम को ही अपनी नियति मान लिया है। कोरोना लॉकडाउन में फंसे पहाड़पुरा के श्रमिक राजू, संजीव व अजय बताते हैं कि लॉकडाउन के कारण कामधाम बंद हो गया था। कमाया पैसा भी खत्म होने लगा, खाने पीने की परेशानी हो रही थी।, घरवालों से कहकर तो गए थे कि अब शहर में रहेंगे और और गांव नहीं लौटेंगे। इस गांव में रखा ही क्या है। बड़े शहरों की बात ही और है, मजे से कमाई करो और मौज मस्ती से घूमो फिरो, खाओ पिओ और मौज करो लेकिन क्या पता था कि जहां पर अपना खून पसीना बहा रहे हैं वह शहर जरूरत पड़ने पर एकदम बेगाना हो जाएगा। शहर से लौटने के बाद क्वारंटाइन होकर बाहर निकलने के पश्चात गांव में ही काम करना अच्छा लग रहा है। सूरत की फैक्ट्री में काम करने वाले धर्मेंद्र, गौरव, सुखबीर जो कभी अपने हुनर और काम को लेकर इतराते थे और अन्य कोई काम नहीं करते थे, वो आज शौक से दूसरे काम को अपना रहे हैं।

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