मेरा टेसू यहीं अड़ा, खाने को मांगे दही बड़ा.

मेरा टेसू यहीं अड़ा, खाने को मांगे दही बड़ा.
Publish Date:Fri, 30 Oct 2020 05:03 PM (IST) Author: Jagran

संवाद सहयोगी, जसवंतनगर : ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में अनेक प्राचीन परंपराएं चलती हैं। खेल खेल में कलात्मक गतिविधियों द्वारा बच्चों को कैसे संस्कारित करना है, यह भारतीय लोक समुदाय अच्छी तरह समझता था। शायद इसलिए ही ऐसे अवसर जुटाए जाते थे जिन पर बालक-बालिकाएं अपनी सृजनात्मक प्रवृत्तियों को तुष्ट भी कर सकें और उन्हें अपनी परंपराओं का भान भी हो सके। ऐसा ही एक बाल खेल उत्सव टेसू-झैंझी का विवाह है। जो प्राय: सारे उत्तर भारत में खेला और मनाया जाता है। यद्यपि अब यह बालक-बालिकाओं का संयुक्त मनोरंजक खेल उत्सव विलुप्तता की ओर है। उसकी वजह विदेशी संस्कृति की ओर भाग रहे लोग भारतीय लोक कलाओं को रूढि़वादिता व अशिक्षा से जोड़कर कंप्यूटर खेलों की ओर आकर्षित हैं। आज के बच्चे कीमती वीडियो गेम, कंप्यूटर, मोबाइल में ज्यादा व्यस्त दिखाई देते हैं। उन्हें नहीं पता कि टेसू-झैंझी के विवाह की क्या परंपरा है। इसमें दशहरे से शरद पूर्णिमा तक निकलने वाले टेसू की प्रथाएं कुछ गांव में अभी भी जारी हैं। इसके तहत जसवंतनगर के मोहल्ला मोहन की मड़ैया में किशोर उम्र के लड़के टेसू लेकर घूम-घूमकर टेसू का गीत गाये। तो बदले में उन्हें पैसे मिले। लेकिन अब बहुत कम ही लड़के टेसू लेकर निकलते हैं। टेसू लेकर चल रहे इन बच्चों की टोली में शामिल सदस्य जो प्रमुख रूप से गाना गाते हैं उनमें मुख्य रूप से मेरा टेसू यहीं अड़ाए, खाने को मांगे दही बड़ा. जो अब गायब होने लगे हैं।

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.