बिगड़े हालात से चुनौती और बढ़ी, इंतजाम नाकाफी

जनपद में रैंडम जांच की नौबत स्टाफ पर्याप्त नहीं स्वास्थ्य केंद्रों पर नहीं एलाइजा टेस्ट की व्यवस्था

JagranWed, 27 Oct 2021 05:33 AM (IST)
बिगड़े हालात से चुनौती और बढ़ी, इंतजाम नाकाफी

जासं, एटा: बुखार को लेकर हालात बिगड़ रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के सामने इन हालातों से निपटने की चुनौती और अधिक बढ़ गई है। विभाग के पास जो इंतजाम हैं वे नाकाफी हैं। स्वास्थ्य केंद्रों पर बुरा हाल है। वहां स्टाफ की कमी तो है ही, अगर रैंडम जांच की नौबत आ जाए तो कर्मचारियों की संख्या कम पड़ जाएगी और जांच की गति धीमी रहेगी।

जनपद के प्रत्येक विकास खंड के गांवों में बुखार से हालात खराब हैं। घर-घर चारपाइयां बिछी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मौतें भी अधिक हो रही हैं। तमाम लोग निजी क्लीनिकों पर अपना उपचार करा रहे हैं। इसके अलावा मरीज जनपद से बाहर के अस्पतालों में भी भर्ती हैं। मौत का आंकड़ा 106 तक पहुंच चुका है, जबकि स्वास्थ्य विभाग बुखार से एक भी मौत नहीं मान रहा। इस समय 60 टीमें गांवों में जाकर चेकिग कर रहीं हैं। टीमों की संख्या बढ़ाए जाने की जरूरत है, लेकिन कर्मचारी नहीं हैं। आशा व आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, एएनएम आदि को भी लगा दिया गया है, मगर बुखार काबू में नहीं आ रहा है। एलाइजा टेस्ट को जिला मुख्यालय तक दौड़

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डेंगू की पुष्टि के लिए एलाइजा टेस्ट जरूरी होता है। स्वास्थ्य विभाग पहले रैपिड कार्ड से टेस्ट कराता है और फिर किसी में अगर डेंगू के लक्षण पाए जाते हैं तो एलाइजा टेस्ट कराता है। प्राइवेट चिकित्सक भी एलाइजा टेस्ट रिपोर्ट को ही मानते हैं। स्थिति यह है कि प्राथमिक एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर एलाइजा टेस्ट की व्यवस्था नहीं है, इसलिए मरीज को जिला मुख्यालय तक आना पड़ता है। मेडिकल कालेज में जिस तरह की मारामारी है उससे स्वास्थ्य विभाग नहीं निपट पा रहा। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले तमाम लोगों का जांच के लिए नंबर ही नहीं आ पाता और वे वापस लौट जाते हैं या फिर प्राइवेट लैब पर जांच कराते हैं। मुफ्त में जांच को लेकर बढ़ रही भीड़

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मेडिकल कालेज की पैथोलाजी पर सीबीसी और एलाइटा टेस्ट कराने वालों की भीड़ इसलिए अधिक बढ़ रही है क्योंकि यहां जांच मुफ्त में हो जाती है, जबकि प्राइवेट पैथोलाजी पर 1800 से लेकर 2000 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। अगर एक घर में दो लोग बीमार हैं और एलाइजा टेस्ट कराना है तो 4000 रुपये तो जांच में ही लग जाएंगे। डाक्टर की फीस और दवा का खर्च अलग रहा। बेड पड़ रहे कम

-मेडिकल कालेज और स्वास्थ्य केंद्रों का हाल यह है कि यहां बुखार के मरीजों के लिए बेड कम पड़ रहे हैं। इमरजेंसी में भी कोई बेड खाली नहीं रहता। यही स्थिति प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की है, वहां भी पर्याप्त बेड नहीं हैं। दरअसल, मेडिकल कालेज की एमसीएच विग में स्वास्थ्य केंद्रों से मंगाकर बेड डाल दिए गए हैं। संसाधनों का अभाव

-यहां संसाधनों का भी अभाव सामने आ रहा है। प्लेटलेट्स की व्यवस्था नहीं है। अगर मरीज अधिक गंभीर है तो दूसरे मेडिकल कालेज के लिए रेफर कर दिया जाता है। दूसरी बड़ी समस्या ब्लड डोनेट को लेकर आ रही है। ब्लड बैंक में तमाम ऐसे मोबाइल नंबर हैं जो डोनेट करने वालों ने गलत दे दिए हैं। इन दिनों डेंगू के मरीजों को अधिक आवश्यकता पड़ रही है, लेकिन फोन करने पर पता चलता है कि नंबर काम ही नहीं कर रहा। कई लोग ट्राई करके थक चुके हैं। --

स्वास्थ्य विभाग के पास जो व्यवस्थाएं हैं उनका उपयोग किया जा रहा है। बुखार के कारण विभाग के समक्ष चुनौती तो है ही, लेकिन हमारी टीमें गांवों में बेहतर तरीके से काम कर रहीं हैं।

- डा. उमेश चंद्र त्रिपाठी, मुख्य चिकित्साधिकारी, एटा

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