जेल की तन्हाई में मुकम्मल हुई गजल

बुलंदशहर, जेएनएन। 'इतना दर्द मिला मुझे जमाने से, मुकम्मल गजल बन गई इसी बहाने से' और 'है धरती धरो तुम धीर, बहना अब आंखों से नीर' ऐसी तमाम पंक्तियां जिला कारागार की दीवारों के पीछे पन्नों में सिमट कर किताब का रूप ले रही हैं। जेल में बंद एक कैदी और बंदी ने अपने मन के भाव और दर्द को किताब का रूप दिया है। जेल सुधार कार्यक्रम के तहत शुरू की गई मुहिम का असर है कि 'तन्हाइयां' और 'दर्द ए दास्तां' नामक दो किताबें प्रकाशन के लिए तैयार हैं। दोनों ही किताबों के कवर पेज का जिला कारागार में सोमवार को विमोचन किया गया।

जिला कारागार में बंद बंदियों और कैदियों के हृदय परिवर्तन के लिए तमाम कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इसके अलावा इनके अंदर छिपी प्रतिभा को मुकाम देने और रचनात्मक लेखन के लिए भी नई पहल शुरू की गई है। इस पहल का असर भी सामने आने लगा है। जेल सुधार कार्यक्रम चला रहे प्रदीप रघुनंदन के प्रयास से कैदी और बंदी ने अपने दिल में छिपे दर्द को कागज पर उतार कर किताब का रूप दिया और कविता संग्रह को आकार मिला। दोनों किताबों में 50-50 कविता और गजल हैं।

गंभीर आरोप में बंद

जहांगीराबाद थाना क्षेत्र निवासी देवेंद्र शर्मा एमए बीएड शिक्षक है। वह हत्या के आरोप में जेल की सलाखों के पीछे आया और आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। ऐसे ही दूसरा बंदी है बुलंदशहर निवासी आसिफ। वह दुष्कर्म के आरोप में विचाराधीन बंदी के रूप में जेल में बंद है। इन्होंने कहा ..

बंदी और कैदियों में प्रतिभा की कमी नहीं है। ऐसी ही प्रतिभा को तराश कर उन्हें मुकाम दिया जा रहा है। जेल रेडियो के बाद बुलंदशहर जेल में यह दूसरा बड़ा प्रयास बंदी और कैदियों के लिए किया गया है।

- प्रदीप रघुनंदन, जेल सुधारक

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बंदियों में हो रहा वैचारिक परिवर्तन किताब के रूप में सामने आया है। अन्य कैदी और बंदी भी अब सुधार के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों में बढ़-चढ़ कर भागीदारी कर रहे हैं।

- ओपी कटियार, जेल अधीक्षक।

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