जुगाड़तंत्र के सहारे दौड़ाई जा रहीं रोडवेज बसें

कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा..। जी हां यह कहावत नजीबाबाद रोडवेज डिपो पर बिल्कुल सटीक बैठती है। दरअसल सामान के अभाव में एक-एक कर बसें खड़ी होती चली गईं। डिमांड करने के बाद भी जब सामान नहीं मिला तो खराब बसों से ठीक सामान निकालकर शेष बसों को दुरुस्त रखने की कोशिश की जा रही है। इसके बावजूद हालात नहीं सुधरे।

JagranSat, 24 Jul 2021 06:21 AM (IST)
जुगाड़तंत्र के सहारे दौड़ाई जा रहीं रोडवेज बसें

जेएनएन, बिजनौर। कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा..। जी हां, यह कहावत नजीबाबाद रोडवेज डिपो पर बिल्कुल सटीक बैठती है। दरअसल, सामान के अभाव में एक-एक कर बसें खड़ी होती चली गईं। डिमांड करने के बाद भी जब सामान नहीं मिला, तो खराब बसों से ठीक सामान निकालकर शेष बसों को दुरुस्त रखने की कोशिश की जा रही है। इसके बावजूद हालात नहीं सुधरे। पिछले दिनों निरीक्षण को पहुंचे उच्चाधिकारी तो जूनियर फोरमैन को निलंबित कर चले गए, लेकिन व्यवस्थाओं को सुधारने पर ध्यान नहीं दिया। दर्जनभर बसें खराब खड़ी हैं। कुछ एआरटीओ दफ्तर पर सरेंडर हैं। कुछ नीलामी के लिए प्रस्तावित हैं। अनुबंधित बसें भी कम हो गई हैं।

-कई दिन से खराब खड़ी बसें

सामान के अभाव में कार्यशाला परिसर में दर्जनभर बसें काफी समय से खराब खड़ी हैं। 2948, 2180 को गियर बाक्स, 9257, 8344, 2099, 8986, 0327 को इंजन, 9386, 1756 को सेल्फ बैटरी, 0360 को स्टियरिग, 8740 को एम-40 मेंटेनेंस के अभाव में खड़ा रखा गया।

-खड़ी बसों से निकाला सामान

डिपो पर खड़ी 2734, 6216, 3462, 4397 बसें एक वर्ष से ज्यादा समय से एआरटीओ कार्यालय पर सरेंडर हैं। इनमें 2734 के अलावा 1758, 1756, 4128 और 9012 नंबर की बस नीलामी के लिए प्रस्तावित हैं। इन बसों से सामान निकालकर अन्य बसों की मेंटिनेंस की जा रही है।

-संविदा स्टाफ के भरोसे निगम

डिपो पर निगम के मात्र 49 चालक और 18 परिचालक हैं, जबकि संविदा के 74 चालक और 99 परिचालक हैं। कर्मचारी अभाव में निगम के कई वेतनभोगी चालक-परिचालक विभिन्न पटलों पर सेवाएं दे रहे हैं। जबकि, संविदा चालक-परिचालक की आजीविका बसों के संचालन पर निर्भर है। उत्तराखंड में संविदा चालकों को 2.40 रुपये और यूपी में डेढ़ रुपया प्रति किलोमीटर के हिसाब से भुगतान किया जा रहा है।

-खफा हैं संविदा चालक-परिचालक

संविदाकर्मी दबी जुबान कहते हैं कि 30 दिन में 22 ड्यूटी अनिवार्य हैं। जिसमें पांच हजार किलोमीटर पूरे करने पर तीन हजार रुपये इंसेंटिव मिलता है। कई बसों की हालत अच्छी नहीं है। पैसा कमाने के लिए यात्रियों के जीवन से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। बसों को अपने खर्च पर सुधारकर रूट पर ले जाने का दबाव बनाया जा रहा है। ऐसा नहीं करते हैं, तो खाली बैठने को मजबूर हैं।

-इनका कहना है

प्रत्येक गुरुवार को आवश्यक सामान की डिमांड मुख्यालय भेजी जाती है। काफी समय से पर्याप्त सामान नहीं मिल पा रहा है। बसों की मरम्मत, रखरखाव और बेहतर संचालन में दिक्कत आ रही है।

-डोजीलाल, सीनियर फोरमैन, रोडवेज डिपो नजीबाबाद

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