चौपालों से ही सिंहासन पर विराजमान होते थे प्रधान जी

चौपालों से ही सिंहासन पर विराजमान होते थे प्रधान जी

आजादी के चार दशक तक ग्राम प्रधान के पद पर गांव के सम्मानित और सेवा भाव वाले व्यक्ति को ही खड़ा किया जाता था बिना किसी लालच के लोग अपना वोट दे देते थे। गांव की चौपाल से ही प्रधान सिंहासन पर बैठा करते थे। यदि उस समय पंचायत चुनाव हो भी जाता था तो ग्रामीण प्रत्याशी को एक मत होकर जीता हुआ मान लेते थे। लेकिन आज के दौर में चुनाव का ट्रेंड ही बदल गया है।

JagranWed, 14 Apr 2021 10:54 AM (IST)

जेएनएन, बिजनौर। आजादी के चार दशक तक ग्राम प्रधान के पद पर गांव के सम्मानित और सेवा भाव वाले व्यक्ति को ही खड़ा किया जाता था, बिना किसी लालच के लोग अपना वोट दे देते थे। गांव की चौपाल से ही प्रधान सिंहासन पर बैठा करते थे। यदि उस समय पंचायत चुनाव हो भी जाता था तो ग्रामीण प्रत्याशी को एक मत होकर जीता हुआ मान लेते थे। लेकिन, आज के दौर में चुनाव का ट्रेंड ही बदल गया है।

सन 1987-88 के बाद से पंचायतों में वित्तीय योजना आरंभ होने के बाद चुनाव का स्वरूप साल दर साल बदलता चला गया। योजनाओं के कारण वर्तमान पंचायत चुनावों में नोटों की बौछार के साथ बाहुबलियों के चुनाव में कूदने से गांव का सम्मानित व समाज सेवा को समर्पित व्यक्ति किनारा करने लगे हैं।

ग्रामीण ईश्वर दयाल, वयोवृद्ध रामफल सिंह का कहना है कि गांव वाले चुनाव में ऐसे सक्षम व्यक्ति को चुनते थे, जो समय आने पर गरीबों की मदद कर सके तथा सभी भेदभाव, जातिवाद से ऊपर उठकर गांव की सेवा व रक्षा कर सके। आजादी से पहले गांव की देखरेख और अन्य महत्वपूर्ण निर्णय के लिए गांव के ही एक सेवा भाव वाले बुजुर्ग को मुखिया बनाया जाता था। आजादी के बाद गांव में मुखिया के स्थान पर प्रधान बनने लगे।

बुजुर्ग ग्रामीणों के अनुसार 1947-50 के दशक में ग्रामीण एक चौपाल पर बैठकर गांव के ही समाजसेवी के गुण को देखकर उस व्यक्ति को सर्वसम्मति से प्रधान चुनकर गांव के सिंहासन पर बैठा देते थे। वह प्रधान भी ग्रामीणों की अपेक्षाओं पर खरा उतरता था, लेकिन अब आधुनिकता की दौड़ में ग्राम पंचायत के चुनाव भी हाइटेक हो गए हैं।

मास्टर राजेंद्र सिंह बताते हैं कि आजाद भारत के रूप में लोगों ने एक सपना देखा था कि भाईचारे व प्रेम, विकास और शांति का प्रतीक ऐसा मुल्क हो, जिसमें सभी को रोटी, कपड़ा और मकान मिल सके। समाजसेवी महाशय कल्याण सिंह आर्य का कहना है कि इस समय में पंचायत चुनाव रंजिश निकालने व शासन से आई धनराशि को हड़पने व मान प्रतिष्ठा के लिए लड़ा जाता है। यही कारण है कि सेवा भाव वाले व्यक्तियों ने चुनाव से किनारा कर लिया है। आज की राजनीति भी दोषपूर्ण हो गई है। कहीं जाति देखकर तो कहीं धर्म देखकर चुनाव होता है।

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