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Lockdown Eid Special 2020 : यह नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करों Bareilly News

बरेली, [वसीम अख्तर]। हालात के मद्देनजर जब किसी शायर का दिल दुखा तो उसने अवाम के दर्द को शेर में बयां कर दिया। ऐसी ही गजल की दो पंक्तियां 33 साल पहले मेरठ में दंगों के बाद डॉ. बशीर बद्र ने लिखी। जब-जब उन्होंने इसे मुशायरे में पढ़ा, ध्यान से सुना और दाद से नवाजा गया लेकिन जमाने की पूरी तरह सच्चाई अब आकर बनी हैं। कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, यह नये मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो। यह शेर आज हकीकत का फलक छुएगा। अपनी तरह की यह पहली ईद होगी, जब लोग गले मिलने से गुरेज करके शेर के सच होने का गवाह बनते नजर आएंगे।

गजल की निशान देही जैसा माहौल: ईद आने से पहले ही गले नहीं मिलने का आह्वान धार्मिक घरानों से हो चुका है। दुनियाभर में सुन्नी बरेलवी मुसलमानों का मरकज कहलाने वाले दरगाह आला हजरत के सज्जादानशीन मुफ्ती अहसन रजा खां कादरी कह चुके हैं कि ईद पर न हाथ मिलाएं और न ही गले में। एक दूसरे के घर जाए बगैर फोन पर मुबारकबाद दें। शारीरिक दूरी का ध्यान रखें। लोग हाथ मिलाना पहले ही बंद कर चुके हैं। आज यह साफ हो जाएगा कि ईद भी गले मिले बगैर ही मनी।

होशो हवास में नहीं देख पाए यह दिन: गजलों का समंदर कहे जाने वाले शायर बशीर बद्र का जब यह शेर इतना ज्यादा मकबूल हुआ और जमाने की हकीकत बना तब तक वह होशो हवास खो चुके हैं। डिमेंसिया के चलते उन्हें कुछ याद नहीं है। वसीम बरेलवी बताते हैं कि बशीर बद्र साहब के साथ आखिरी मुशायरा छत्तीसगढ़ के स्थापना दिवस पर रायपुर में पढ़ा था। तब उनकी याददाश्त जवाब देने लगी थी। अल्लाह से दुआ है कि उन्हें सेहत बख्शे।

शायरी पर दंगे का असर : प्रोफेसर वसीम बरेलवी बताते हैं कि 1987 के आसपास मेरठ में दंगों के बाद बशीर बद्र की कई गजल अवाम के बीच बेहद मकबूल हुई। उन्हीं में एक नये मिजाज का शहर वाली थी, जिसका पहला शेर- यूं ही बेसबब न फिरा करो, कोई शाम घर में रहा करो, वो गजल की सच्ची किताब है। उसे चुपके चुपके पढ़ा करो, था। प्रो. वसीम कहते हैं कि जरूरी नहीं कि कोई शेर कह जाने के बाद हकीकत बने। बहुत से शेर काफी वक्त बाद में जमाने का सच बनकर सामने आए। वह बताते हैं कि वह मेरे घर नहीं आता, में उसके घर नहीं जाता, मगर इन एहियात से ताल्लुक मर नहीं जाता, यह शेर काफी पहले कहा था लेकिन लॉकडाउन में खूब वायरल हुआ।

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