मखाना भरेगा अन्नदाता का खजाना, रुहेलखंड विवि करेगा मखाना उत्पादन पर शोध

प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजनाओं में शामिल किसानों की आय दोगुनी करने के लिए किए जा रहे प्रयासों में विश्वविद्यालय भी सहायक बनेगा। इसके लिए शासन से रुहेलखंड विश्वविद्यालय में शिक्षकों को शोध कार्यों के लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट योजना के तहत मखाना उत्पादन पर शोध की जिम्मेदारी दी है।

Ravi MishraWed, 28 Jul 2021 09:57 AM (IST)
मखाना भरेगा अन्नदाता का खजाना, रुहेलखंड विवि करेगा मखाना उत्पादन पर शोध

बरेली, अंकित शुक्ला : प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजनाओं में शामिल किसानों की आय दोगुनी करने के लिए किए जा रहे प्रयासों में विश्वविद्यालय भी सहायक बनेगा। इसके लिए शासन से एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय में शिक्षकों को शोध कार्यों के लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट योजना के तहत 2021-22 में मखाना उत्पादन पर शोध के लिए जिम्मेदारी दी गई है। जहां किसानों, छात्रों को जागरूक करने के लिए एक माडल तैयार कर इसके बारे में विस्तार से जानकारी व प्रशिक्षण दिया जाना है।

विश्वविद्यालय में प्लांटेशन साइंस के प्रो. संजय कुमार गर्ग को यह जिम्मेदारी दी गई है। उनके नेतृत्व में जल्द ही मखाना उत्पादन के लिए एक माडल तैयार किया जाएगा। इसके लिए विश्वविद्यालय की खाली जमीन का चयन भी कर लिया गया है। उन्होंने बताया कि माडल तैयार करने के लिए शासन से ढाई लाख रुपये की प्रथम किस्त भी स्वीकृत हो गई है। प्रो. संजय कुमार के मुताबिक रुहेलखंड का वातावरण मखाना की खेती के अनुकुल है। यहां बिहार के पूर्णिया से अच्छा उत्पादन हो सकता है। मखाना का बोटैनिकल नाम यूरेल फेरोक्स सलीब है जिसे आम बोलचाल की भाषा में कमल का बीज भी बोलते हैं। यह ऐसी फसल है जिसे पानी में उगाया जाता है। जो कि देश में सबसे ज्यादा बिहार के मिथिलांचल (मधुबनी और दरभंगा) में होता है।

बिना खाद व कीटनीशकों के होती है खेती

मखाना बेहद पौष्टिक खाद्य पदार्थ है। इसमें प्रोटीन प्रचुर मात्र में होता है। सोडियम, कैलोरी और वसा की मात्र काफी कम होती है। बिना खाद व कीटनाशकों के इसकी खेती की जाती है। किडनी, रक्तचाप, हृदय रोग में यह काफी फायदेमंद होता है। इसे लोग देवभोजन भी कहते हैं। इन्हीं गुणों के कारण विदेशों में इसकी काफी मांग है। वजन घटाने के इच्छुक लोग भी इसका सेवन करते हैं।

आम के आम गुठलियों के दाम

मखाना की खेती हर ओर से किसानों के लिए फायदेमंद है। किसान जलसंरक्षण के साथ ही जहां इसी में मतस्य पालन कर सकते हैं। वहीं मखाना उत्पादन में सबसे पहले कमल का फूल, कमलगट्टा की बाजार में अच्छी बिक्री होती है। इसके अलावा मखाना की डिमांड स्वयं सबसे अधिक होती है। यही नहीं बीज खरीदने में भी ज्यादा खर्च नहीं होता है। क्योंकि पिछली फसल के बीज से नए पौधे उग जाते हैं। खर्च के नाम पर केवल मजदूरी के ही रुपये लगते हैं।

इस तरह तैयार होता है मखाना

प्रो. संजय कुमार गर्ग बताते हैं कि पानी के ऊपर लगे फसलों की छंटाई की जाती है। फसल के दाने को पहले भूना जाता है। फिर उसे फोड़कर बाहर निकाला जाता है। जिसे धूप में सुखाकर इसी फसल पूरी तरह तैयार मानी जाती है। इसलिए मजदूर का सहारा लेना पड़ता है। बाजार में इसकी मांग को देखते हुए किसान मखाना बेचकर कई गुना मुनाफा कमा लेते हैं। सबसे बड़ी दिक्कत पके बीज जिसे फोड़कर मखाना निकाला जाता है को पानी के सतह के ऊपर से और पानी के अंदर से निकालने में होती है।

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