मेहनती और मेधावी अर्धांगिनी के छूते ही मिट्टी में आ जाती है जान, पढ़ें कैसे महिला ने पति के काम को नया मुकाम दिया

Story of Woman Struggle कला से माटी को विविध आकार देकर बहुमूल्य व उपयोगी बनाने वाले उमाशंकर प्रजापति को हुनर तो विरासत में मिला। लेकिन उनकी पत्नी सरोजनी साथ काम करके कला में इस कदर निपुण हो गई कि उनके छूते ही मिट्टी प्राणवान बन जाती है।

Samanvay PandeyMon, 25 Oct 2021 06:05 AM (IST)
बाबूजई निवासी सरोजनी माटी से लक्ष्मी गणेश की मूर्तियां गढ़ने के साथ बनाती है रसोई के बर्तन समेत सजावटी सामान

बरेली, (नरेंद्र यादव)। Story of Woman Struggle : कला से माटी को विविध आकार देकर बहुमूल्य व उपयोगी बनाने वाले उमाशंकर प्रजापति को हुनर तो विरासत में मिला। लेकिन उनकी पत्नी सरोजनी साथ काम करके कला में इस कदर निपुण हो गई कि उनके छूते ही मिट्टी प्राणवान बन जाती है। यही नहीं मेहनती व मेधावी अर्धांगिनी के प्रोत्साहन से उमाशंकर ने माटी की मूर्तिया, बर्तन बनाने का कारखाना भी लगाया है। जहां 6 महिलाओं समेत 15 लोग प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार भी पा रहे है।

शाहजहांपुर शहर के मुहल्ला बाबूजई निवासी उमाशंकर प्रजापति ने पिता हुलासीराम का बचपन से पैतृक कारोबार में हाथ बंटाया और माटी कला का हुनर सीख लिया। शादी के बाद पत्नी सरोजनी के साथ चाक पर माटी से खुशहाल जिंदगी के सपने गढ़ने शुरू कर दिए। माटी के दीये, गमले, घड़ा, सुराही के साथ रसोई में बर्तनों को भी माटी से बनाने की कला सीख ली। नवाचार अपनाकर उन्होंने चाक पर कटोरी, थाली, तवा, कूकर, लालटेन, केतली, फैंसी गिलास समेत रसोई में प्रयोग किए जाने वाले उत्पादों की लंबी रेंज उतार दी। इससे उनकी मंडल स्तर पर पहचान बन गई। पत्नी सरोजनों के परिष्करण से उत्पादों को अलबेला व अनोखा बना दिया।

हुनर सिखाने वाले पति भी हुनर के हुए मुरीद : माटी कला से अनूठी पहचान बनाने वाले उमाशंकर भी पत्नी सरोजनी के हुनर के मुरीद है। दरअसल पत्नी के हाथों से बनी लक्ष्मी, गणेश, दुर्गा माता की प्रतिमाएं खूब पंसद की जाती है। इसके लिए उन्हें आर्डर भी मिलते है। फैंसी गिलास, दीये समेत रसोई में प्रयोग आने वाले बर्तनों सजावटी सामान के आंवला, पीलीभीत, बदायूं, फर्रूखाबाद, सीतापुर आदि जिलों में भी मांग है।

माटी कला से गरीबी को दी मात, दिया रोजगार : शादी के बाद सरोजनी ने गरीबी को जिया। लेकिन माटी कला में दक्ष पति उमाशंकर के साथ मिलकर उन्होंने गरीबी को मात दे दी। वर्तमान में खुद वह घर पर माटी कला के बूते 15 से 20 हजार की कमाई कर रही है, जबकि उमाशंकर ने कांट और मगेरा में माटी कला का कारखाना लगाकर तीन गुना कमाई का जरिया बना लिया। उनके इस प्रयास से 15 लोगों को रोजागर भी मिला है।

हुनर और संस्कार से गढ़ी पीढ़ी : माटी कला के कारोबार की वजह से उमाशंकर हाईस्कूल तक ही पढ़ पाए। सरोजनी ने घरेलू शिक्षा प्राप्त की। लेकिन दंपती ने बच्चों की पढाई पर पूरा ध्यान दिया। बेटा शिवानंद बीकाम का छात्र है। रनवीर, गणित से एमएससी व बीएड के बाद बच्चों को पढ़ा रहे है। स्नातक बड़ी बेटी की शादी कर दी। बिधि स्नातक छोटी बेटी प्रेमलता ने जज बनने का सपना संजोया है।

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