लोगों में घट रहा वीआइपी नंबरों का क्रेज, करोड़ों के नुकसान में जा रहा बरेली आरटीओ, जानिए क्या है वजह

High Security Registration Number Plate अब लोगों का वीआइपी नंबरों की ओर क्रेज कम होता जा रहा है। इससे आरटीओ को हर माह आनलाइन बुक होने वाले नंबरों को फ्रीज करना पड़ रहा है। ऐसे में आरटीओ को प्रति माह करोड़ों का नुकसान हो रहा है।

Ravi MishraTue, 30 Nov 2021 07:57 AM (IST)
लोगों में घट रहा वीआइपी नंबरों का क्रेज, करोड़ों के नुकसान में जा रहा बरेली आरटीओ, जानिए क्या है वजह

बरेली, जेएनएन। High Security Registration Number Plate  : वाहनों में हाई सिक्योरिटी रजिस्ट्रेशन नंबर प्लेट (एचएसआरपी) अनिवार्य कर दी गई है। निजी वाहनों में उनके रजिस्ट्रेशन नंबर के आधार पर तारीख व माह नियत किया गया है। वहीं इस नंबर प्लेट के चलते अब लोग डिजाइनर नंबर प्लेट का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। ऐसे में अब लोगों का वीआइपी नंबरों की ओर क्रेज कम होता जा रहा है। इससे आरटीओ को हर माह आनलाइन बुक होने वाले नंबरों को फ्रीज करना पड़ रहा है। ऐसे में आरटीओ को प्रति माह करोड़ों का नुकसान हो रहा है।

संभागीय परिवहन विभाग से हर सीरीज में साढ़े तीन सौ वीआइपी और वीवीआइपी नंबर जारी होते हैं। जिसमें से 0001 और 9999 जैसे अन्य नंबरों का आधार मूल्य एक लाख रुपये तक का होता है। जिनका आवंटन आनलाइन बोली के माध्यम से किया जाता है। विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 15 से अधिक सीरीज में चुनिंदा नंबर ही बिक पाए हैं। जबकि अन्य वीआइपी व वीवीआइपी नंबरों की कोई बोली नहीं लगी है। जिसके चलते उन्हें फ्रीज किया गया है। ऐसे में चार हजार से अधिक नंबर न बिक पाने से विभाग को करोड़ों रुपये का घाटा हुआ है। सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी प्रशासन मनोज सिंह के मुताबिक डीए सीरीज से शुरु होकर इस समय जारी सीरिज तक पहुंच चुका है।

वीआइपी नंबरों की चार श्रेणी

वीआइपी नंबरों को आकर्षक, अति आकर्षक महत्वपूर्ण और अति महत्वपूर्ण श्रेणी में बांटा गया है। अलग-अलग तय श्रेणी का आधार मूल्य तय है। पंसद आने वाले नंबर के लिए विभागीय वेबसाइट पर आनलाइन बोली में हिस्सा लेना होता है। सबसे अधिक बोली लगाने वाले को नंबर आवंटित कर दिया जाता है।

सितंबर 2019 में वाआइपी नंबरों का आधार मूल्य बढ़ने के बाद से मांग कम हुई, जबकि पहले नंबरों के लिए मारामारी होती थी। जबकि अब लोग बोली ही नहीं लगा रहे हैं। जिससे विभाग को नुकसान हो रहा है। - मनोज सिंह, एआरटीओ प्रशासन

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