बरेली के इस गांव से कोरोना वायरस को लगता हैै डर, अभी तक गांव में किसी को नहीं हुआ कोरोना संक्रमण

बरेली शहर से 15 किमी की दूरी पर अंगूरी गांव में नहीं है एक भी कोविड पॉजीटिव।

कहो दद्दा का हाल है तुमाए दुपाहरी में आराम कर रये का जावो घर के अंदर बैठो नहीं तो कहुंए कोरोना के शिकार हुई जाओ अरे नाहीं बिटिया हमाए गांव में कोरोना घुसई न सकत। जा देख रहीं पीपल पाकड़ और बरगद के पेड़ जे हमाए साथ है।

Samanvay PandeyTue, 04 May 2021 08:05 AM (IST)

बरेली, (मधु सिंह)। कहो दद्दा का हाल है तुमाए, दुपाहरी में आराम कर रये का, जावो घर के अंदर बैठो नहीं तो कहुंए कोरोना के शिकार हुई जाओ.... अरे नाहीं बिटिया हमाए गांव में कोरोना घुसई न सकत। जा देख रहीं पीपल, पाकड़ और बरगद के पेड़ जे हमाए साथ है। गांव के मोड़ा खूब मेहनत करत, बहुएं बिटिया खान-पान को ध्यान रखत। तो कोरोना आए कहां ते। वा देखो वो बिटिया पानी भरके लाइ रहीं। मुंह पर घूंघट है कोई बीमारी लग ही नहीं सकत। ये संवाद गांव अंगूरी में घुसते ही जागरण की रिपोर्टर और गांव के बुजुर्ग अंगदलाल के बीच का है।

जब गांव के बुजुर्ग अंगदलाल को पेड़ के नीचे बैठा देखा तो बातचीत शुरू हुई। कोरोना महामारी में एक तरफ बरेली शहर में स्थिति बिगड़ी हुई है। तो दूसरी ओर मात्र 15 किलोमीटर दूरी पर बसे इस गांव में पिछले एक साल से अब तक कोरोना का एक मरीज नहीं है। उसका सबसे बड़ा कारण है कि यहां के लोग मेहनतकश और जमीं से जुड़े हैं। उनके रहन-सहन से लेकर खान-पान सब घर का ही है। सबसे बड़ी खूबी इस गांव की है कि यहां के ज्यादातर लोग उच्च शिक्षित हैं। फिर भी वो युवा न तो गाय का गोबर डालने से कतराते हैं। न ही खेतों में काम करने से उन्हें कोई गुरेज हैं।

घर की महिलाएं शिक्षित होते हुए भी आज भी संस्कारी हैं। बुजुर्गों और बड़ों से पर्दे करती है। जिसका लाभ आज उन्हें मिल रहा है। इतना ही नहीं आज भी इस गांव में बुजुर्ग महिलाएं और शिक्षित महिलाएं घर की चक्की का हाथों से पिसा आटा और दलिया प्रयोग में ला रहीं हैं। गांव के अंदर जाकर जागरण ने रिपोर्टर ने पड़ताल की। तो इनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता का राज जाना। आइये ले चलते हैं आज आपको अंगूरी गांव की ओर...

मेहनत, घूंघट और पनघट के साथ सतर्कता

गांव के बुजुर्ग पेड़ों की छांव में लेकर गये, जहां ट्राली से पानी चल रहा था, बगल में ही पीपल के पेड़ के नीचे कुछ युवा और बुजुर्ग बैठे हुए थे। जब उनसे बातचीत की गई। तो कुलदीप सिंह ने बताया पिछली साल से अब तक हमारे गांव में कोई भी पॉजीटिव नहीं है। पिछली साल बाहर काम करने वाले 150 से अधिक लोग आए। सभी को प्रधान गोपेंद्र पाल सिंह ने ग्रामीणों की सहायता से स्कूलों में आइसोलेट किया। इसके बाद जिनके घर खाली थे। वहां भी आइसोलेट कराया। इस बार ज्यादातर लोग होली पर आए। इसके बाद गये नहीं। कुछ गये वो आए नहीं है। युवाओं का कहना था कि हमारे गांव में सभी घर से लेकर खेतों तक मेहनत करते हैं। हैंडपंप से खींचकर पानी भरते हैं। यहां तक कि पशुओं को भी वहीं से पानी पिलाते हैं। इतने बड़े गांव में सिर्फ 4 सबमर्सिबल हैं। खेतों का गेहूं, खेतों का धान और बगल के गांव से सब्जियां प्रयोग में लाते हैं। जब बाहर जाना ही नहीं तो कोरोना आएगा कहां से। 

इस प्रकार से दूर है अभी तक कोरोना

गांव के निवर्तमान प्रधान ने बताया कि पिछली साल जितने भी लोग आए सभी की जांच कराकर गांव के अंदर जाने दिया। इसके साथ ही गांव में कोई बाहरी आदमी का प्रवेश नहीं होने दिया। जो सब्जियां पास गांव में खेतों में होती हैं। उनका ही प्रयोग करते हैं। घर का गेेहूं और धान होता ही है। इसके साथ ही कुछ समय तक आटा चक्कियों पर नहीं पिसवाया था। पिछली साल भी इस साल भी मजदूरी करने वाले लोगों ने गेहूं और धान की कटाई की। गांव में ही मजदूरी की है। और अभी भी कर रहे हैं। स्कूल कायाकल्प में कुछ मजदूरों को लगाया गया था। जिन लोगों को ज्यादा परेशानी थी। उनको सभी गांव वालों ने मिलकर सहयोग दिया। अभी भी दे रहे हैं।

देसी स्टाइल में होता है सब काम 

गांव में ज्यादातर लोग साइकिल का प्रयोग करते हैं। महिलाएं घर पर दलिया और आटा बनाती है। 80 वर्षीय जयदेवी के घर कुछ चलने की आवाज सुनाई दी। पहुंचे तो देखा कुछ पीस रहीं थीं। पूछा तो बोलीं बिटिया हम अपए लें और गइन के लें दलिया बना रहे। बहुएं आटा पिस लेत। हमने ओर ते काम करो, अबहु हम चाहे कछु कर सकत। देशी खायो और देशी ही पहनो है।हमाए गांव में हैंडपंप से पानी भरा जाता है। सभी औरतें ऐसे ही पानी भरकर लाती हैं।

जानते हैं इनकी राय-

पूर्व आइएमए अध्यक्ष डा रवीश ने बताया कि गांव में यदि इस तरह की दिनचर्या है तो रोगप्रतिरोधक क्षमता निश्चित बेहतर होगी। दूसरी बात अगर पानी हैंडपंप से भर रहे हैं तो उनके फेफड़े काफी मजबूत होते हैं। जो जरूरी है। वहीं गांव के जो घर हैं वो खुले होते हैं। इस वजह से वायरस ज्यादा प्रभावी नहीं होता। ग्रामीणों की दिनचर्या बेहतर होती है। वहीं घूंघट अल्ट्रावायलट किरणों से बचाता है। मुंह नीचे तक ढका होता हैै तो फायदा होता है। लेकिन मास्क फिर भी बहुत जरूरी है।

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