अनोखी है बरेली के इस थाने की दास्तान, गांव में कत्ल की वारदात को रोकने के लिए बना था ये थाना, जानिए पूरा सच

Bisharatangaj Police Station आंवला भमौरा सिरौली और गैनी। यह चार थाने साल 1950 से आंवला सर्किल का हिस्सा बने। बीतते वक्त के साथ घटनाओं ने जोर पकड़ लिया। गनी चौकी में तब्दील हो गई जबकि अलीगंज को थाना बनाया गया।

Ravi MishraSun, 19 Sep 2021 04:45 PM (IST)
अनोखी है बरेली के इस थाने की दास्तान, गांव में कत्ल की वारदात को रोकने के लिए बना था थाना

बरेली, जेएनएन। Bisharatangaj Police Station : आंवला, भमौरा, सिरौली और गैनी। यह चार थाने साल 1950 से आंवला सर्किल का हिस्सा बने। बीतते वक्त के साथ घटनाओं ने जोर पकड़ लिया। गनी चौकी में तब्दील हो गई जबकि अलीगंज को थाना बनाया गया। अतरछेड़ी, सहासा, कर्तिया किसानान, अखा, ढका, खजुआई, नंद जित्तौर, गंगापुर गांव। घटनाओं के चलते यह गांव सुर्खियाें में आने लगे। यह सभी गांव आंवला सर्किल के साथ व उसकी सीमाओं के हिस्सा थे। अतरछेड़ी गांव में खूनी वारदातें रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। इसके बाद साल 1982 में बना थाना बिशारतगंज।

गांव के रहने वाले बुजुर्ग बताते हैं कि 1982 से पहले अतरछेड़ी गांव आंवला थाने का हिस्सा हुआ करता था। यहीं नहीं सहासा, अखा, ढका, खजुआई, नंद जित्तौर, गंगापुर अलीगंज, कर्तिया किसानान भमौरा गांव भी दूसरे थानों का हिस्सा हुआ करते थे लेकिन, बाद में इन सभी गांवों को बिशारतगंज थाने में शामिल कर दिया गया। सुभाषनगर, भमौरा, अलीगंज। तीनों थाने बिशारतगंज थाने की सीमाओं से जुड़े हुए हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि अतरछेड़ी गांव को छोड़कर अन्य गांवों में तो घटनाएं घट गई। थाना बनने के बाद अतरछेड़ी गांव में भी पहले की अपेक्षा घटनाओं में काफी लगाम लगा है लेकिन, बीच-बीच में वर्चस्व की लडा़ई के लिए खूनी खेल के चलते अतरछेड़ी फिर चर्चा में आ जाता है। थाना बनने के बाद से चौहरा हत्याकांड और उसका बदला चर्चित् हत्याकांड बना। अधिवक्ता संजय सिंह हत्याकांड से फिर गांव में लोगों में तमाम तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

विकृत मानसिकता वालों को समझ लेते हैं रोल माडल

बरेली कालेज की मनोविज्ञान विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर सुधा शर्मा के मुताबिक समाज और परिवार की स्थिति सामान्य नहीं होने पर विकृत मनोवृत्ति विकसित होती है। पैथोजेनिक फैमिली पैटर्न के तहत विकृत मानसिकता वाले परिवार के सदस्य ही रोल मॉडल समझे जाते है। उन्हें लगता है कि जो हुआ, जो किया। वहीं अच्छा था। मनोवैज्ञानिक प्रभाव को समझने के लिए क्वालिटी पैरंट माडल को भी समझना होगा।

यह धीमी जहर की तरह होता है। सोच एक दिन में नहीं बदलती है। जब लोग एक जैसा कृत्य करने लगते है तो गलत भी सही समझा जाता है। यह थ्योरी फार्मेशन आफ ग्रुप नार्म की है। इन सबके बीच अतरछेड़ी जैसे गांवों में एक्वायर्ड एटीट्यूट की थ्योरी के मुताबिक विकृत मनोवृत्ति का तानाबाना बचपन से ही रोपित किया जाता है। ये अहम की लड़ाई बन जाता है। बदला लेना गुण समझा जाने लगता है।

बदला लेने की सोच बढ़ा रही हिंसात्मक वारदातें

बरेली कालेज के समाजशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष नवनीत कौर आहूजा के मुताबिक समाज में शक्ति बेहद महत्वपूर्ण अंग होता है। इसे बनाए रखने के लिए कई बार लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं। क्योंकि इसमें लगातार उतार-चढ़ाव आता है। ऐसे में सत्ता या ताकत के लिए संघर्ष होता रहता है। इसी प्रयास में कई बार हिंसात्मक घटनाएं होने लगती हैं। घर के बच्चे जिस माहौल में रहते हैं, किशोरावस्था तक काफी हद तक उसी मानसिकता के हो जाते हैं। ऐसे में शक्ति के संघर्ष के दौरान हुई हत्या का बदला लेने की सोच की वजह से लगातार हिंसात्मक घटनाएं होती रहती हैं।

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