खून से रंगी है बरेली के इस गांव की कहानी...1947 से अब तक 60 कत्ल

Bareilly Crime अधिवक्ता संजय सिंह की हत्या के बाद बिशारतगंज का अतरछेड़ी गांव एक बार फिर चर्चा में आ गया है। आपको जानकार हैरानी होगी कि खूनी रंजिशो के लिए कुख्यात हो चुके अतरछेड़ी गांव में आजादी के बाद से अब तक 60 कत्ल हो चुके हैं।

Ravi MishraSat, 18 Sep 2021 11:45 AM (IST)
खून से रंगी है बरेली के इस गांव की कहानी...1947 से अब तक 60 कत्ल

बरेली, जेएनएन। Bareilly Crime : अधिवक्ता संजय सिंह की हत्या के बाद बिशारतगंज का अतरछेड़ी गांव एक बार फिर चर्चा में आ गया है। आपको जानकार हैरानी होगी कि खूनी रंजिशो के लिए कुख्यात हो चुके अतरछेड़ी गांव में आजादी के बाद से अब तक 60 कत्ल हो चुके हैं। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि कभी अतरछेडी गांव में बहुत बड़ा सर्राफा बाजार हुआ करता था। यहां बनाए जाने वाले स्वर्ण आभूषण दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। गांव में वर्चस्व की लड़ाई शुरू होने के बाद यहां से बड़े पैमाने पर पलायन हो गया गया। 1947 से अब तक गांव में 60 हत्याएं हो चुकी हैं। संजय की हत्या के बाद गांव का माहौल फिर गर्म है। फिर से गांव में पुरानों मामलों की चर्चाएं आम हैं।

ऐतिहासिक है अतरछेड़ी गांव

कठेरिया ठाकुरों की कर्म स्थली कहां जाने वाला अतरछेडी गांव क्षेत्र में ऐतिहासिक गांव का दर्जा रखता है। यहां के लोग अपने आप को नेपाल नरेश का वंशज होने का दावा करते हैं। हालांकि, आंवला के प्रसिद्ध इतिहासकार गिरिराज नंदन इस तथ्य की पुष्टि नहीं करते हैं। अतरछेड़ी गांव क्षेत्र का बेहद शिक्षित गांव है। इस गांव के दर्जनों बाशिंदों ने सरकारी नौकरियों के ऊंचे ऊंचे पदों को हासिल करने के अलावा विभिन्न क्षेत्रों में देश और दुनिया में नाम रोशन किया है। दर्जनों रिटायर्ड पुलिसकर्मी और फौजी हैं। शिक्षक जय गोविंद सिंह व सुखदेव सिंह को राष्ट्रपति पुरस्कार मिल चुका है।

प्रसिद्ध था स्वर्ण आभूषण व खांड का व्यापार

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि कभी अतरछेडी गांव में बहुत बड़ा सर्राफा बाजार और खांड का व्यापार हुआ करता था। यहां बनाए जाने वाले स्वर्ण आभूषण दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। गांव में वर्चस्व और मूंछ की लड़ाई शुरू होने के बाद व्यापारिक मानसिकता लोग सहम गए। आय दिन गांव की मिट्टी खून से सनने लगी। इसी के बाद यहां से पलायन शुरू हो गया। नतीजा यह हुआ कि स्वर्ण आभूषण व खांड के व्यापार के लिए जाना जाने वाला अतरछेड़ी गांव की कहानी खून से रंग गई।

केस : 1 :

सन 1987 में चौहरा हत्याकांड से दहल उठा था गांव

अतरछेड़ी गांव में सन 1987 में हुआ चौहरा हत्याकांड बेहद सनसनीखेज था। मूंछ की लड़ाई में कुछ लोगों ने दिनदहाड़े कैप्टन अहिवरन सिंह व उनके चचेरे भाई नरेंद्र सिंह के घर पर धावा बोलकर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई थी। जिसमे कैप्टन अहिवरन सिंह, नरेंद्र सिंह, नरेंद्र की नौ वर्षीय पुत्री कुसुम एवं पत्नी के गर्भस्थ शिशु की मौके पर ही मौत हो गई थी। एक साथ चार-चार कत्ल से गांव के लोग सहम उठे। चौहरा हत्याकांड का नाम आते ही आज भी लोग सहम उठते हैं।

23 साल बाद साल 2010 में चौहरे हत्याकांड का लिया बदला

चौहरे हत्याकांड का बदला 23 साल बाद 16 दिसंबर 2010 को लिया गया। जिसमें गांव के पूर्व प्रधान अशोक फौजी की बेहद निर्मम हत्या कर दी गई। इसके बाद से गांव में पौने 11 साल तक शांति बनी रही। लंबी खामोशी के बाद 14 सितंबर को अधिवक्ता संजय सिंह की हत्या के बाद अतरछेड़ी गांव फिर चर्चा में आ गया है।

केस : 2 :

सन 1986 में ठाकुर बलराज सिंह की हुई थी हत्या

सन 1986 में गांव के प्रतिष्ठित लोगों में शुमार ठाकुर बलराज सिंह की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी। वारदात को अंजाम तब दिया गया था जब बलराज निसोई रेलवे स्टेशन से उतरकर वापस गांव के लिए जा रहे थे। रास्ते में हमलावरों ने बलराज को घेर लिया और सीने पर गोली मारकर हत्या कर दी थी। इससे पूर्व भी गांव में बांधूराम, रिटायर्ड पुलिसकर्मी राममोहन सिंह, श्रीपाल सिंह, नन्देसिंह, सत्तू उर्फ खन्ना, राजपाल सिंह व उसके दस वर्षीय पुत्र की हत्या बेहद सनसनीखेज थी।

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