बरेली में पढ़ाई के साथ ही शिल्पकला में हुनर दिखा रही कांति

बिटिया ने किताबी ज्ञान खूब लिया साथ ही विरासत में मिले हुनर को कभी धुंधला नहीं होने दिया। हाईस्कूल और इंटर में 90 फीसद से अधिक अंक आने के बाद वह पीसीएस परीक्षा की तैयारी में जुट गई। इसके साथ ही अपने हुनर से परिवार की आर्थिक स्थिति में भी मददगार बन रही। यह बिटिया अब दिवाली के बाजार से आस लगाए बैठी है। मिट्टी की बनाई मूर्तियों की बिक्री अधिक होगी तो पढ़ाई के संसाधन जुटाने में सहजता हो जाएगी। हुनरमंद बिटिया अपने हौसले के बूते हालात से पार पाने में जुटी हुई है उसे आपके साथ की जरूरत है।

JagranMon, 25 Oct 2021 05:45 AM (IST)
बरेली में पढ़ाई के साथ ही शिल्पकला में हुनर दिखा रही कांति

शुभम शर्मा, बरेली: बिटिया ने किताबी ज्ञान खूब लिया, साथ ही विरासत में मिले हुनर को कभी धुंधला नहीं होने दिया। हाईस्कूल और इंटर में 90 फीसद से अधिक अंक आने के बाद वह पीसीएस परीक्षा की तैयारी में जुट गई। इसके साथ ही अपने हुनर से परिवार की आर्थिक स्थिति में भी मददगार बन रही। यह बिटिया अब दिवाली के बाजार से आस लगाए बैठी है। मिट्टी की बनाई मूर्तियों की बिक्री अधिक होगी तो पढ़ाई के संसाधन जुटाने में सहजता हो जाएगी। हुनरमंद बिटिया अपने हौसले के बूते हालात से पार पाने में जुटी हुई है, उसे आपके साथ की जरूरत है।

मूलरूप से पीलीभीत निवासी कांति देवी के पिता ओमप्रकाश बताते हैं कि मिट्टी की मूर्तियां-बर्तन बनाने का हुनर परिवार से मिला। पीलीभीत में मांग कम होती है इसलिए कई वर्षो से बरेली आकर मूर्तियां तैयार करते हैं। जुलाई से दिवाली तक यहां किराये का कमरा लेकर रहते हैं। पिता दीनदयाल ने जो हुनर दिया, उसे बच्चों तक पहुंचा दिया।

पांच घंटे पढ़ाई, चार घंटे मूर्तियां बनाने बैठती हैं कांति

ओमप्रकाश ने बेटी को पढ़ाई में अव्वल देखा तो उसे अफसर बनाने का सपना बनाया। कहती हैं कि कांति पीसीएस अधिकारी बनना चाहती है। फिलहाल स्नातक में प्रवेश लेकर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी भी कर रही। रोजाना पांच-छह घंटे वह पढ़ाई करती है। इसके बाद करीब चार घंटे तक मूर्तियां बनाने में जुट जाती है। कांति बताती हैं कि कठिन को आसान करना ही सबसे बड़ी जीत है। मैं इसी जीत को पाने के लिए डट गई हूं।

अब देसी मूर्तियां ही सभी की पसंद

बाजार में चाइनीज उत्पाद भी हावी हो गए, इस पर ओमप्रकाश कहते हैं कि स्थितियां बदल चुकी हैं। अब लोग देसी मूर्तियां को ज्यादा पसंद करते हैं। चीन से माल नहीं आ रहा, दूसरी बात यह कि लोग उसे पसंद भी नहीं कर रहे। हां, कुछ वर्ष पहले तक स्थितियां अलग थीं। मांग व आय कम होने के कारण परिवार का जीवन-यापन करना कठिन हो रहा था। कई बार मन में आया कि यह काम छोड़कर कहीं मजदूरी या नौकरी करने लगूं। मगर, धीरे-धीरे लोगों ने अपने देश की कला की कद्र करनी शुरू कर दी। खरीदार अब चीन के उत्पादों से दूरी बना रहे हैं। इससे हम लोगों की पुरानी कला में दोबारा नया दम पड़ा है। इसी आय से बेटी की पढ़ाई का इंतजाम भी हो जाता है।

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