भरोसे के 30 साल : आइए, बदलती बरेली को मिलकर बढ़ाएं

बरेली (जेएनएन)।

मिसाल तारीख ही बनाती हैं। उन्हें संजोकर रखती हैं। इतिहास की गवाह बनती है। पल-पात्रों से रूबरू कराती है। किसी से छिपा नहीं है, तारीखों में रुहेलखंड हमेशा ही बड़ा 'वटवृक्ष' बनकर खड़ा रहा। अब से नहीं, सदियों से। खासकर कई उल्लेखनीय घटनाओं को समेटे दिल्ली-लखनऊ के बीच बिल्कुल समान दूरी पर मौजूद बरेली..। तारीखों के संकलन में 12 सितंबर भी बेहद खास है। वर्ष 1989..। इसी दिन जन-जन की आवाज दैनिक जागरण ने यहां की सरजमीं पर कदम रखे और..। लोगों के दुलार, जिम्मेदारी का बोझ उठाते-उठाते कब तीन दशक गुजर गए, पता नहीं चला। इस दौरान बरेली में कई उतार-चढ़ाव आए। वह चाहे गाहे बगाहे नफरत (सांप्रदायिक तनाव) के बादल घिरने का वक्त हो या विकास की बात..। हर वक्त दैनिक जागरण चट्टंान बनकर आमजन के साथ खड़ा रहा। सिस्टम को हिला देने वाली धारदार खबरों और मुद्दों के बल पर..। यही वजह है, जिस सौहार्द पर संकट से आज देश के तमाम शहर गुजर रहे हैं, बरेली ने उन्हें पूरी तरह नकार दिया। हां, घर है। बर्तन खटक ही जाते हैं लेकिन, दिलों को कभी नहीं टूटने दिया। चर्चा विकास की चमक को लेकर होती, तब भी जागरण मुखर दिखा। वह चाहे हवा में उड़ने का ख्वाब हो या दो हिस्से में बंटे शहर को जोड़ने की मुहिम..। उस सिलसिले को हमने छोड़ा नहीं है। न छोड़ेंगे। इसीलिए फिर हाजिर हैं। नई जिम्मेदारी, तेवर और भरोसा लेकर। अपनी स्थापना के 30वें बसंत के मौके पर। जिस जिम्मेदारी को उठाकर हम चले थे, उसे मुकाम तक पहुंचाने के लिए। आपके साथ मिलकर तेजी से बदलती बरेली को और संवारने, सहेजने के लिए..। तो आइए, मिलकर कहें-बदलकर रहेंगे बरेली..।

--बहुत पाया और की जरूरत

जिस वक्त दैनिक जागरण ने सफर शुरू किया था, शहर की आबादी महज साढ़े चार लाख थी। आज हम 14 लाख को पार कर चुके हैं। भीड़भाड़ भरे छोटे से बाजार में झुमका खोजते लोगों के बीच मॉल और मल्टीप्लेक्स आ गए। नई कॉलोनियों ने नया विस्तार दे दिया। छोटे मकानों की जगह बहुमंजिला इमारतें तनकर खड़ी हैं। उड़ान जो महज सपना थी, सिविल एविएशन के जरिये पूरा से चंद फासले दूर है। दो हिस्सों में बंटे शहर की दूरी श्यामगंज पुल ने मिटा दी। टै्रफिक लाइट के इशारे पर हम चलने लगे। प्रियंका चोपड़ा, दिशा पाटनी, राहुल जौहरी और रजत मूना जैसी अनगिनत हस्तियां रुहेलखंड की ख्याति देश और विदेश तक पहुंचा रहे है। और भी बहुत कुछ है, जिसके दम पर हम परवाज भर सकते हैं। बस, जरूरत मौजूदा सिस्टम और सुविधाओं को बेहतर ढंग से उपयोग करने की है।

--जागरण अभियान, तरक्की की पहचान

यह कोई पहला मौका नहीं है, जब दैनिक जागरण ने रुहेलखंड या कहें बरेली की बेहतरी को लेकर कदम आगे बढ़ाया है। प्रयास अर्से से जारी है। हम सिर्फ खबरों तक नहीं रहते। सामाजिक सरोकार के मुद्दों को हमेशा प्राथमिकता में रखा है। अपने अभियान के जरिये रुहेलखंड को हमेशा राह दिखाने प्रयास किया है।

--आखिर कब बदलेगी बरेली की तकदीर

सितंबर 2012 याद होगा। उस दौरान बंद कमरे के फोरम तक सीमित नहीं रही विकास की बात। मंथन में जो मुद्दे सामने आए, उन्हें लगातार उठाया। जिम्मेदारों को याद दिलाता रहा कि आपने क्या-क्या वादे किए हैं। वादों का साल बीता यानी सितंबर 2012 आई तो हम फिर तैयारी से उतर गए। आंकडे़ और हकीकत के सुबूत हमारे पास थे। तमाम मुअज्जिज लोगों को फिर बुलाया, उनसे जाना कि क्या किया अपने शहर के लिए..?

--अब विकास की बात

स्थापना के 23 वर्ष पूरे होने पर जागरण ने बरेली समेत पूरे मंडल के विकास के मुद्दे को उठाया। वर्ष 2013 में हमने क्षेत्र के तमाम मुअज्जिज लोगों को बैठाकर विकास पर चर्चा की। अफसर, नेताओं, उद्योगपतियों, व्यापारियों, महिलाओं, समाजसेवी, छात्रों को साथ लाकर वादा लिया कि कुछ करके दिखाएंगे..।

--स्मार्ट सिटी स्मार्ट सिटिजन

सिलसिला 2014 में और दम भर गया। इसलिए क्योंकि देश ने बड़ा बदलाव देखा। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी केंद्र में काबिज थे। विकास के नए रोडमैप के जरिये वे देश को आगे ले जाने का दावा कर रहे थे। चुनाव में उन्होंने खूब सपने दिखाए थे। स्मार्ट सिटी उन्हीं में एक था। स्वच्छता अभियान उसी का हिस्सा था। उस दौरान भी दैनिक जागरण आगे आया लेकिन नए अंदाज में। नारा दिया कि शहर तब स्मार्ट बन सकता है, जब उसके नागरिक स्मार्ट हों। उसी को ध्यान में रखते हुए सफाई अभियान की मुहिम छेड़ी। पॉलीथिन पर प्रतिबंध के प्रयास किए। यह हमारी कोशिश थी, चंद महीने में ही नतीजा आने लगे थे। जागरण की कोशिश थी, कि वर्षो से अटका बड़ा बाईपास दौड़ने लगा।

--कामयाब-26

रुहेलखंड में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। कभी रही भी नहीं। वर्ष 2015 में हम रुहेलखंड के ऐसे ही कुछ दमदार कामयाबी के 'हीरो' के साथ उपस्थित हुए। वैज्ञानिक, गजब लोग सामने आए। खिलाड़ी, अचूक निशानेबाज, तमाम बड़ी-बड़ी कंपनियों में शीर्ष तक पहुंचने वाले, मंगल ग्रह मिशन में शामिल होने वालों से रूबरू कराया। कामयाब-26 के जरिये।

--शहर के हमकदम

वर्तमान के साथ हम समय-सयम पर अतीत से भी रूबरू कराते हैं। इस कोशिश में ताकि वर्तमान यानी हमारी मौजूदा पीढ़ी कुछ सीख सके। उसी कड़ी में हमने 2016 में शहर के हमकदम तलाशे। वे लोग जिन्होंने शहर को बढ़ते देखा, उसमें योगदान दिया। यानी 27 ऐसे परिवार जिनका योगदान बरेली के लिए खास था।

--बनाएं सपनों की बरेली

सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए पिछले साल हमने बरेली को बढ़ाने का अभियान छेड़ा। उस महायोजना के जरिये जो विकास के स्वरूप के लिए खींची गई थी। हालांकि, बाद में उसे स्मार्ट सिटी योजना में मर्ज कर दिया गया।

--अब वर्तमान को संवारने की बात

इस दफा हमने भविष्य, अतीत के साथ वर्तमान पर फोकस किया है। यानी तमाम जतन करके हमने जो पा लिया, उसे कैसे ठीक से प्रयोग किया जाए। मसलन, हवाई यात्रा से हमारा शहर कैसे रफ्तार भरेगा, नए पुल कैसे राहत देंगे। साथ में उन जरूरतों पर भी बात होगी, जो आगे चाहिए होंगी..। तो फिर रहिये हमारे साथ, विकास का हमकदम बनकर..।

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