यहां अनोखी परंपरा, मुर्गे को दाना चुगा करते हैं शोभायात्रा की अगुवाई

यहां अनोखी परंपरा, मुर्गे को दाना चुगा करते हैं शोभायात्रा की अगुवाई

लाकडाउन के बाद पुन शुरू होगी पीर रत्ननाथ शोभायात्रा की परंपरा विशिष्ट है रोट चढ़ाने की सांस्कृतिक बलि

JagranSun, 11 Apr 2021 10:13 PM (IST)

बलरामपुर : कोरोना महामारी के कारण 700 साल के इतिहास में गत वर्ष खंडित पीर रत्ननाथ शोभायात्रा की परंपरा इस बार पुन: शुरू होगी। चैत्र नवरात्र के पंचमी को नेपाल के दांग चौघड़ा से शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर आने वाली पीर रत्ननाथ की शोभायात्रा दोनों देशों की आस्था का प्रतीक है।

शोभायात्रा के दौरान श्रद्धालु मुर्गो को यात्रा मार्ग पर दाना चुगाते हुए चलते हैं। मान्यता है कि मुर्गो को दाना चुगाकर मांगी गई मन्नतें जरूर पूरी होती हैं। प्रतिवर्ष चैत्र नवरात्र में देश-विदेश के श्रद्धालु देवी की आराधना के लिए यहां आते हैं। खास बात है कि देवी मइया की पांच दिनों तक नेपाल के पुजारी पूजा-अर्चना करते हैं। इस दौरान मंदिर के घंटे-घड़ियाल बंद हो जाते हैं।

700 वर्ष पुराना है इतिहास :

पीर रत्ननाथ की शोभायात्रा का इतिहास करीब 700 वर्ष पुराना है। 'देवीपाटन मंदिर का इतिहास' नामक पुस्तक में गुरु गोरक्षनाथ के दो सिद्धासन का उल्लेख है। एक नेपाल के दांग व दूसरा शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर में है। गुरु गोरक्षनाथ के अनुयायी पीर रत्ननाथ दांग से देवीपाटन आकर शक्ति की साधना करते थे। एक दिन मां पाटेश्वरी देवी ने उन्हें दर्शन देकर वर मांगने को कहा। रत्न नाथ ने देवी मां से उनकी पूजा के साथ अपनी भी पूजा का वरदान मांगा। देवी मां चैत्र नवरात्र के पांच दिन तक उनकी पूजा का वरदान देकर अंतध्र्यान हो गईं। तब से चैत्र नवरात्र की पंचमी से नवमी तिथि तक शक्तिपीठ देवीपाटन में नेपाल के पुजारियों द्वारा पूजा की परंपरा है। विशिष्ट है सांस्कृतिक बलि :

महंत मिथिलेश नाथ योगी का कहना है चैत्र नवरात्र की पंचमी को आने वाली रत्ननाथ की शोभायात्रा का विशेष महत्व है। पात्र देवता के तुलसीपुर पहुंचने पर श्रद्धालु जगह-जगह उनका गर्मजोशी के साथ स्वागत करते हैं। पात्र देवता के पूजन में सांस्कृतिक बलि भी विशिष्ट है।

बच्चों से पक्षियों को उड़ाने की परंपरा :

श्रद्धालु मुर्गा, कबूतर सहित अन्य पक्षियों को बच्चों के हाथों से लेकर उड़ाते हैं। वहीं, शोभायात्रा के आगे-आगे भक्त मुर्गो को दाना चुगाते चलते हैं। माताएं अपने बच्चों की सलामती के लिए आटे व गुड़ की बनी रोट चढ़ाती हैं। मान्यता है कि मुर्गा व कबूतर सिद्ध पीर रत्ननाथ के डाकिए थे। जो दैवीय शक्ति के माध्यम से उन्हें सूचना देने का काम करते थे। तब से बच्चों के माध्यम से इन पक्षियों को छोड़ने की परंपरा भी है। माना जाता है कि ऐसा करने से सिद्ध पीर रत्ननाथ बच्चों की रक्षा करते हैं।

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