यहां बार-बार टूटता रहा बंधा, वे भरते रहे अपनी जेब

लवकुश ¨सह

जागरण संवाददाता, बलिया : एनएच-31 से जुड़े दुबेछपरा ¨रग बंधा पर एक बार फिर टूटने के कगार पर आ पहुंचा है। दूबे छपरा ¨रग बंधा के घेरे में लगभग 65 हजार की आबादी है। बुधवार को बंधा का 50 मीटर हिस्सा नदी में समाहित हो चुका है। इसकी मजबूती के लिए शासन ने लगभग 29 करोड़ का बजट दिया था। जिससे विभाग ने पिछले वर्ष से ही बोल्डर आदि का काम करा रहा है। इलाकाई लोग मानते हैं कि यह बंधा हर साल बाढ़ का प्रकोप झेलते-झेलते कमजोर हो गया है। वहीं ¨सचाई विभाग के अधिकारी और ठेकेदार इसकी मजबूती के नाम पर अपनी जेब भरते रहे हैं। यदि ईमानदारी से यहां काम कराया गया होता तो 29 करोड़ की बजट से यह बंधा काफी मजबूत हो जाता। लेकिन यहां हर बार के कार्य में लूट-खसोट की ही कहानी मिलती है। वर्ष 1952 में गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा इस बांध का निर्माण कराया गया था। करीब तीन किलोमीटर की लंबाई के इस बांध को मजबूत करने में हर साल विभाग कार्य कराता है ¨कतु खतरा कभी भी कम नहीं हुआ। इस बांध ने अब तक गोपालपुर, दयाछपरा, जगदेवा और टेंगरही पंचायत के निवासियों की हिफाजत की है। वहीं रिकिनीछपरा, मीनापुर, गंगापुर, शाहपुर, चौबेछपरा और श्रीनगर के लोग पहले ही अपना सब कुछ गंवा चुके हैं। यदि गंगा नदी का सिलसिला यूं ही जारी रहा तो एक बार फिर वर्ष 2016 की पुनरावृत्ति होने की संभावना बढ़ गई है। गांव के लोग बताते हैं कि इस स्थान पर हुए कार्य की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। तभी विभागीय अधिकारियों और ठेकेदार बेनकाब होंगे। इस साल यदि यह बंधा टूटा तो गांव वाले किसी को भी बख्शने के मूड में नहीं हैं। --याद है 2016 का वह भयानक मंजर

सभी को याद है दो साल पहले अगस्त की वह भयानक रात जब अचानक हर ओर से आवाज आने लगी-भागो रे भागो, टूट गया है दूबे छपरा ¨रग बंधा। जो जहां था वह भागने लगा। पशुओं को खूंटे से खोल भगा दिया गया। बच्चों को गोद में उठाकर लोग भाग रहे थे। तब भी बंधा टूटने की आशंका लोगों को तीन दिन पहले से ही थी, लेकिन इलाकाई लोगों ने साहस व संघर्ष से बंधे को आखिरी समय तक बचाने का प्रयास किया था। प्रशासनिक व्यवस्था को दरकिनार कर जनता ने खुद सिर पर बालू से भरी बोरियों को सिर पर उठा कर कटान स्थल पर डाला था। प्रशासनिक अमला तो बंधे की दशा व नदी का रुख देख पहले ही लोगों से गांव खाली करने का निर्देश देकर अपना पल्ला झाड़ लिया था। जनता के हौसले को देख प्रशासन भी दोबारा मैदान में उतरा और उनके साथ कदम से कदम मिला कर चलने लगा, लेकिन गंगा को कुछ और ही मंजूर था। 27 अगस्?त 2016 को यह बंधा दिन में ही टूट गया। इससे 2003 और 2013 में भी गंगा में आई बाढ़ की वजह से इस बांध के टूटने का रिकार्ड है। इसके बाद इस ¨रग बांध का जिम्मा ¨सचाई विभाग को दे दिया गया था। तब से लेकर अभी तक यह बंधा विभाग के लिए धन कुबेर कोष बना हुआ है।

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जहां बंधा कट रहा है वहां लगातार बचाव कार्य जारी है। हर हाल में बंधे को टूटने से बचाने के लिए उपाय किया जा रहा है। कटान स्थल पर लगातार बोरियां डाली जा रही है। ऐसे समय में सभी को धैर्य से काम लेना चाहिए। यह प्रकृतिक आपदा है। इसे पल में रोक पाना किसी के बस की बात नहीं है।

--सीएम शाही, एसडीओ, बाढ़ खंड

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