अंधाधुंध रासायनिक खाद के प्रयोग से गायब हुई मिट्टी की सोंधी गमक

जागरण संवाददाता बलिया अधिक उत्पादन के चक्कर में किसान अंधाधुंध रासायनिक खादों का प्रयोग क

JagranFri, 03 Dec 2021 11:40 PM (IST)
अंधाधुंध रासायनिक खाद के प्रयोग से गायब हुई मिट्टी की सोंधी गमक

जागरण संवाददाता, बलिया : अधिक उत्पादन के चक्कर में किसान अंधाधुंध रासायनिक खादों का प्रयोग कर रहे हैं। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति कमजोर हो चली है। सब्जी और अन्य फसलों को कीटो से बचाने के लिए किसान भारी संख्या से कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे लोगों का स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है। सिताबदियारा क्षेत्र के किसान बच्चालाल सिंह बताते हैं कि पहले जब बारिश की बूंदें सूखी धरती पर पड़ती थीं तो एक अलग प्रकार की सोंधी खुशबू आती थी। अब रासायनिक खाद के प्रयोग के कारण मिट्टी की वह गमक गायब है। हमारे भोजन का 95 प्रतिशत भाग मृदा से ही आता है। मिट्टी की सेहत को लेकर अब सरकार संग आम लोगों को भी जागरूक होने की जरूरत है।

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नमामि गंगे योजना से शुरू हुई जैविक खेती : जनपद में नमामी गंग योजना से जैविक खेती की ओर किसान तेजी से अपना पांव बढ़ा रहे हैं। गंगा किनारे स्थित सोहांव, दुबहड़, बेलहरी, बैरिया व मुरलीछपरा सहित 41 राजस्व गांवों में संचालित है। इसमें 20-20 हेक्टेयर के कुल 60 कृषक समूहों का गठन किया गया है। विकासखंड सोहांव में 12, दुबहड़ में 16, बेलहरी में 17, बैरिया में एक और मुरलीछपरा में 14 कृषक समूहों को गठन किया गया है। योजना का उद्देश्य गंगा किनारे के 5 से 7 किमी के अंदर गांवों में बिना रासायनिक खाद प्रयोग किए जैविक खेती के माध्यम से गंगा को प्रदूषित होने से बचाना है। जैविक खेती करने वाले किसानों को शासन से प्रति हेक्टेयर प्रथम वर्ष 12 हजार, द्वितीय वर्ष 10 हजार और तृतीय वर्ष 9 हजार के अनुदान दिए जा रहे हैं।

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-बोले किसान-महंगा बिकता है उत्पाद

जैविक खेती करने वाले किसानों में जनाड़ी गांव के कृषक वीरेंद्र ठाकुर, हल्दी के जितेंद्र सिंह, बेलहरी के रमेश ओझा आदि ने बताया कि जैविक खेती में लागत कम है और इसके उत्पाद भी बाजारों में महंगे रेट में बिक रहे हैं। मुबारकपुर के संजय राय ने बताया कि जैविक खेती में हम हरी खाद, जीवामृत, वीजामृत, गोमूत्र, नीम आयल, जैविक कीटनाशक व खादों का प्रयोग कर फसल का उत्पादन कर रहे हैं। मुरलीछपरा के ब्लाक प्रमुख कन्हैया सिंह बड़े पैमाने में जैविक खेती करते हैं। उन्होंने बताया कि सभी को जैविक खेती की ओर लौटना पड़ेगा। मिट्टी की सेहत को लेकर हम इसी बात से अनुमान लगा सकते हैं कि पहले बिना किसी रसायनिक खाद के ही अच्छा उत्पादन हो जाता था। अब तमाम जतन करने के बाद भी उत्पादन कम होता जा रहा है। ऐसे में सभी किसानों को मिट्टी की सेहत की चिता करनी होगी।

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-भूमि परीक्षण की नहीं है व्यवस्था

जनपद में टीडी कालेज के पास मृदा परीक्षण लैब है लेकिन इसमें दो साल से मिट्टी की जांच नहीं हो पा रही है। भूमि परीक्षण लैब के अध्यक्ष रामधनी सिंह कुशवाहा ने बताया कि शासन स्तर से सुविधाएं नहीं दी जा रहीं हैं। जांच के लिए केमिकल तक नहीं है। ऐसे में किसान जांच के लिए आते है लेकिन सुविधा के अभाव में जांच नहीं हो पा रही है।

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सभी कृषकों को जैविक खेती के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है। उनकी समस्याओं का समाधान किया जा रहा है। मृदा सुधार के साथ उत्पादन बढ़ाने के उपाय भी बताए जाते हैं। शासन से प्रति हेक्टेयर प्रथम वर्ष 12 हजार, द्वितीय वर्ष 10 हजार और तृतीय वर्ष 9 हजार के अनुदान भी दिए जा रहे हैं।

इंद्राज, कृषि उप निदेशक, बलिया

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