यहां के अधिकारी आरटीआइ को नहीं देते कोई महत्व

जागरण संवाददाता, बलिया : सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 इसलिए लागू हुआ था कि इस कानून के माध्यम से आमलोग भी किसी विभाग से अहम जानकारी ले सकें और विभागीय भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सकें। प्रदेश के अन्य जिलों में इस कानून का भले ही पालन होता हो लेकिन बलिया के अधिकारी इस कानून को कोई विशेष महत्व नहीं देते। उन्हें आरटीआइ के समय सीमा का भी कोई ख्याल नहीं होता। इस कानून की धज्जियां उड़ाने में खाद्य एवं औषधि विभाग तथा बाल विकास परियोजना (आंगनबाड़ी) विभाग भी पीछे नहीं है। दोनों विभागों में विगत तीन दिसम्बर-2018 को आवेदन देकर कुछ अहम जानकारियां मांगी गई थी लेकिन आज तक दोनों ही विभागों ने जानकारी देना उचित नहीं समझा।

बाल विकास परियोजना कार्यालय ने की अनदेखी

नगर में स्थित बाल विकास परियोजना (आंगनबाड़ी) कार्यालय से जानकारी मांगी गई थी कि जिले में कुल कितने आंगनबाड़ी और मिनी आंगनबाड़ी केंद्र हैं। यहां कुल कार्यकत्रियों और सहायिकाओं की संख्या कितनी है। ब्लाकवार कुल कितने कार्यालय हैं। क्या सभी आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चों की पढ़ाई और पोषाहार का वितरण प्रतिदिन किया जाता है। आंगनबाड़ी या मिनी आंगनबाड़ी केंद्रों पर कितनी मात्रा में पोषाहार मुहैया कराया जाता है। यदि हां तो वितरण का मानक क्या है।

जनवरी 2018 से दिसम्बर 2018 तक जिले में फर्जी प्रमाणपत्र पर कार्यकत्री की नौकरी करने वाली कितनी महिलाओं पर कार्रवाई की गई है।

इसके अलावा मांगी गई अन्य जानकारियों में कार्यकत्रियों के शैक्षिक प्रमाण पत्रों की जांच कैसे की गई। क्या संबंधित संस्था से रिपोर्ट मांग कर जांच की गई है। जिले में ऐसे कितने आंगनबाड़ी केंद्र या मिनी आंगनबाड़ी केंद्र हैं जिसके बारे में वहां के लोगों को भी कोई जानकारी नहीं है। उनकी भी संख्या बताएं। कार्यकत्रियों के जिम्मे कौन-कौन से कार्य सरकारी तौर पर सौंपे गए हैं। सभी आंगनबाड़ी केंद्रों पर प्रत्येक माह किस स्तर से चे¨कग की जाती है..आरटीआइ दाखिल करने के बाद किसी भी ¨बदु का जवाब अभी तक आवेदक को नहीं मिला।

खाद्य एवं औषधि विभाग भी बेपरवाह

आरटीआइ के तहत खाद्य एवं औषधि विभाग से जानकारियां मांगी गई थी कि जिले में फूड और मेडिकल की कुल कितनी दुकानों को विभाग की ओर से लाइसेंस जारी किया गया है। जनपद में फूड या मेडिकल की कुल कितनी दुकानें अभी अवैध रुप से बिना लाइसेंस चल रही हैं। फूड और मेडिकल की अवैध दुकानों पर कार्रवाई करने में क्या परेशानी हैं। जांच के दौरान संबंधित दुकानों को क्या सेम्पल की कीमत भी देनी होती है। यदि हां तो वर्ष 2018 में जनवरी से दिसंबर तक जिले में कुल कितनी दुकानों से जांच के दौरान कीमत अदा कर सेम्पल लिए गए हैं। जिन दुकानों से सेम्पल लिए गए हैं, उनमें कितनी दुकानों के रिपोर्ट आ चुके हैं और उनपर कितना जुर्माना लगाया गया। पूरी सूची उपलब्ध कराएं। जनवरी 2018 से दिसम्बर 2018 तक जुर्माना के तौर पर कुल कितने रकम की वसूली की गई। दुकानों से जांच को लिए गए सेम्पल को जांच के लिए कहां भेजा जाता है और वहां से जांच रिपोर्ट कितने दिनों में आ जाती है। जनवरी 2018 से दिसम्बर 2018 तक कुल कितनी दुकानों के सेम्पल की रिपोर्ट प्राप्त हो गई है। यहां से भी किसी भी ¨बदु का कोई जवाब नहीं मिला। इसी तरह जिले में और भी कई विभाग हैं जो इस कानून को कोई महत्व नहीं देते।

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