सतरंगी टीके व फूलों की माला से बहनें मांगतीं मन्नत

विजय द्विवेदी, बहराइच

त्योहार एक। मान्यता एक। आस्था एक, लेकिन अंदाज अलग-अलग। धनतेरस, दीपावली और भैया दूज का पर्व भारत व नेपाल में अलग-अलग अंदाज में मनाया जाता है। नेपाली परंपरा का कलेवर लिए यह पर्व अनूठे अंदाज में मनाने का रिवाज है।

भैया दूज पर बहनें भाइयों के दीर्घायु होने की कामना उसी भाव और आस्था से करती हैं, लेकिन इस पर्व पर मन्नत मांगने से पहले नेपाल में बहनें अपने भाइयों को सतरंगी टीका लगाकर पहले तीन प्रकार के फूलों की मालाएं पहनाती हैं, फिर लंबी उम्र की कामना करती हैं। लखीमपुर खीरी, बहराइच, श्रावस्ती व बलरामपुर से लेकर महाराजगंज जिले की सीमा नेपाल की पीठ से सटी है। नेपाल में भी भारत की ही तरह प्रकाश पर्व दीपावली धूमधाम और उल्लास के साथ मनाया जाता है। नेपाल में दीपावली की शुरुआत भारत के ही तरह धनतेरस से हो जाती है। धनतेरस के दिन यहां जब लक्ष्मी-गणेश की पूजा होती है तो नेपाली काग पक्षी की पूजा करते हैं। दूसरे दिन काल भैरव, तीसरे दिन गो माता और दीपावली वाले दिन लक्ष्मी-गणेश और बैल की पूजा की जाती है। इस दौरान रोली, अक्षत का प्रयोग तो होता ही है, बड़ी-बड़ी अल्पनाएं और रंगोलियां भी सजाई जाती हैं। घरों में उल्लास और उमंग की लहरें साफ नजर आती हैं। दशहरे से ही नेपाल में त्योहारों की हरियाली छा जाती है। परदेश में रहने वाले नेपाली दशहरे से ही अपने वतन की ओर चल देते हैं। नेपाल के रुकुम जिले के बासीकोट वार्ड नंबर दो के रहने वाले धन बहादुर खत्री बताते हैं कि हमारे यहां भैया दूज मनाने का रिवाज थोड़ा अलग है। भैया दूज के दिन नेपाली बाजारों में सन्नाटा रहता है, क्योंकि त्योहार पर अधिकांश लोग घरों पर ही रहकर आस्था से त्योहार मनाते हैं।

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