इस बार शांति के बाद जख्म कुरेदेगी कुदरत की मार

गजरौला गंगा किनारे पर बसे गांवों में रहने वाले लोगों को बाढ़ के सीजन से राहत मिली भी नही थी।

JagranThu, 21 Oct 2021 12:49 AM (IST)
इस बार शांति के बाद जख्म कुरेदेगी कुदरत की मार

गजरौला : गंगा किनारे पर बसे गांवों में रहने वाले लोगों को बाढ़ के सीजन से राहत मिली भी नहीं थी कि एक बार फिर से कुदरत की मार शुरू हो गई जो, पूर्व में दिए जख्मों को कुरेदने का काम करेगी। चूंकि इन जख्मों पर न तो सहायता रूपी मरहम लगता और न ही खादरवासियों की पीड़ा से कोई सरोकार रखता है।

बाढ़ खंड विभाग के मुताबिक 15 जून से लेकर 15 अक्टूबर तक बाढ़ का सीजन रहता है। इन दिनों के बीच बाढ़ जैसे हालात भी बनते हैं। इस बार भी बने थे। खादर के दर्जन भर गांव कई दिनों तक पानी में घिरे थे। ग्रामीण नाव व ट्यूब के सहारे अपने जीवन की गाड़ी चलाते हुए नजर आए। पशु चारा के अभाव में भूखे थे। इंसान भी रोटी के लिए परेशान थे। सेहत बिगड़ने पर दवा भी नहीं मिल रही थी। ऐसे हालातों के साथ जीवन पूरी तरह से बेपटरी था।

धीरे-धीरे बाढ़ का सीजन खत्म होने का समय आया तो सबकुछ सामान्य होने लगा। 15 अक्टूबर तक गंगा शांत थी, खादर का इलाका सूखने लगा था। खेत से पानी भी खत्म था। खुशहाली की गाड़ी पटरी पर लौटने लगी थी मगर, 17 व 18 अक्टूबर को हुई मूसलधार बारिश ने फिर से खादरवासियों के सामने मुसीबतों की दीवार खड़ी कर दी। जो, जख्म भरे भी नहीं थे, कुदरत ने उन्हें फिर कुरेद दिए। बुधवार को 2.70 लाख क्यूसेक पानी छोड़ा गया जो, शाम तक यहां पहुंचेगा। आशंका है कि इससे खादर का इलाका पूरी तरह से जलमग्न हो जाएगा। दीगर बात यह है कि बाढ़ से होने वाले नुकसान का प्रशासन-शासन द्वारा कोई मुआवजा भी नहीं दिया गया। मंगलवार की शाम सब कुछ ठीक था लेकिन, रात में अचानक से पानी गांव में घुस गया। सुबह उठकर देखा तो गंगा का पानी घरों तक पहुंच गया था। ऐसा काफी लंबे समय बाद हुआ है। बाढ़ तो आती थी मगर, सीजन खत्म होने से पहले ही चली जाती थी।

हरपाल सिंह, प्रधान पति, शीशोवाली। इस बार अचानक मां गंगे के रूप को देखकर लगभग दस साल पुराना ²श्य याद आ गया। तिगरी मेले की तैयारी चल रही थी और बिना सीजन के बाढ़ जैसे हालात बन गए थे। काफी परेशानी का सामना करना पड़ा था। उसी तरह का माहौल इस बार बन गया है।

निपेंद्र यादव, गांव तिगरी। काफी दिनों से गंगा शांति के साथ बह रही थी लेकिन, यह सब अचानक हुआ। वो भी इतना बड़े स्तर पर कि फसलें भी पूरी तरह से जलमग्न हो गई हैं। लोगों के खेतों में पहुंचने पर भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। अभी पानी कम नहीं हुआ है।

सुरेंद्र सिंह, गांव तिगरी। काफी लंबे समय तिगरी गंगा इस रूप में देखने को मिली है। हालांकि ये तो प्राकृतिक आपदा है, कभी भी आ सकती है। वर्ष 2010 में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखा गया था। बिना सीजन के बाढ़ जैसे हालात थे। गंगा घाट पूरी तरह से डूबे हुए हैं। दाह संस्कार स्थल भी डूब गया है। पुरोहितों की झोपड़ियां भी बह गईं। अभी पानी कम होने का नाम नहीं ले रहा है।

पंडित गंगाशरण शर्मा, गांव तिगरी।

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