सरयू नदी की बाढ़ अभिशाप के बाद बन जाती वरदान

अंबेडकरनगर : वर्षा ऋतु के आगमन संग सरयू/घाघरा नदी की जल धारा आसपास के किसानों को गहरा जख्म देती हैं। बाढ़ की अंधेरी रात के बाद मुनाफा कमाने का चटख सुबेरा भी इन्हीं जलधारा के बीच होता है। सरयू की गोद में झलकती सफेद चांदी (बालू) पर तो सबकी निगाह टिकी रहती है। हालांकि यह सिर्फ मुनाफे का ही सौदा है। इससे इतर किसानों के लिए बाढ़ नुकसान के साथ ही जीवनयापन भी कठिन बना देती है। जलधारा के बीच में बसे मांझा क्षेत्र में सैकड़ों परिवारों के लिए नदी विकराल रूप अभिशाप बनता है। ग्रीष्म ऋतु के आने पर यही नदी वरदान भी साबित होती है। बाढ़ के वापस लौटेते ही जायद की फसल में ककड़ी, खीरा, तरबूज आदि उगाने के लिए सूखी नदी की चमकती रेत छोड़ जाती है। सैकड़ों बीघा भूमि में खेती कर किसान अपने नुकसान की भरपाई कर मुनाफा भी कमा लेते हैं। इसी आय से सालभर परिवारों का भरण पोषण होता है।

वर्षा ऋतु आते ही सरयू (घाघरा) नदी के दो जल धाराओं और आसपास रहने वाले सैकड़ो परिवार हर साल नदी में आने वाली बाढ़ की आशंका से ही सिहर उठते है। ऐसा हो भी क्यों नहीं नदी में आने वाली बाढ़ बहुत कुछ तबाह कर देती है। घर-गृहस्थी, बच्चों को लेकर सुरक्षित पलायन करने पर मजबूर कर देती है। सैकड़ो वर्षो से बाढ़ की विभीषिका से लड़ते आ रहे ग्रामीण की समस्या का कोई स्थायी हल नहीं खोजा जा सका है। प्रत्येक वर्ष बाढ़ आने पर उजड़ना और बाढ़ के उतर जाने पर अपने श्रम के बलबूते फिर गृहस्थी बसाना ग्रामीणों की नियति में शुमार हो गया है। कहते हैं प्रकृति लेती है तो कुछ देती भी है। ऐसा ही ग्रामीणों के साथ होता है। वर्षा ऋतु में अभिशाप बनकर बाढ़ के उतरते वरदान भी साबित होती है। नदी के दो जल धाराओं के बीच हजारों हेक्टेयर रेत उभर आती है। किसानों इसपर रबी की फसलों को लहराता देख बाढ़ का दर्द भूल जाते हैं। जायद की फसलें खीरा, ककड़ी, तरबूज, खरबूज, परवल, करेला, कद्दू आदि की खेती करके लाखों रुपये कमा लेते है। नदी की बालू की रेत पर तरबूज, खीरा, ककड़ी आदि की खेती कर रहे किसान सुरेंद्र मांझी, राहुल टिकू, पियारी, सुनील आदि ने बताया कि नदी की बाढ़ हर साल कहर बरपा रहती है। हजारों लोग घर परिवार छोड़ने पर मजबूर होते हैं। यही नदी वरदान भी साबित होती है। इसी आय से साल भर की गृहस्थी चलती है।

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