सावधान! बालमन पर आप की अपेक्षाएं भारी न पड़ जाएं, नहीं बनाएं ज्यादा दबाव

कोरांव की एक छात्रा ने बताया कि वह 10वीं और 12वीं में बहुत अच्छे अंक के साथ पास हुई। उसके बाद परिवार वाले उन्हें अफसर बनाना चाहते हैं। करियर संवारने को लेकर उम्मीदों का बोझ इतना पड़ने लगा कि वह पढ़ाई से डरने लगी हैं। पढ़ने में मन नहीं लगता

Ankur TripathiThu, 25 Nov 2021 01:20 PM (IST)
प्रयागराज के मनोविज्ञानशाला में लगा दो दिवसीय निर्देशन एवं परामर्श शिविर

प्रयागराज, जागरण संवाददाता। अनियमित दिनचर्या, बदलती जीवन शैली, करियर को लेकर अभिभावकों की उम्मीदों का बोझ बाल व किशोर मन पर भारी पड़ रहा है। तमाम युवा भी टूट रहे हैं। फलस्वरूप एकाग्रता की कमी, हिंसक प्रवृत्ति, चिड़चिड़ापन व व्यवहार संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। इन्हीं समस्याओं के समाधानके लिए मनोविज्ञानशाला में दो दिवसीय निर्देशन एवं परामर्श शिविर का आयोजन किया गया।

परिवार वाले चाहते हैं कि अफसर बनूं, नहीं लगता पढ़ाई में मन

मनोविज्ञानी डा. राजकुमार राय ने बताया कि दो दिन के शिविर में 122 लोगों की काउंसिलिंग की गई। कोरांव की एक छात्रा ने बताया कि वह 10वीं और 12वीं में बहुत अच्छे अंक के साथ पास हुई। उसके बाद परिवार वाले उन्हें अफसर बनाना चाहते हैं। करियर संवारने को लेकर उम्मीदों का बोझ इतना पड़ने लगा कि अब वह पढ़ाई से डरने लगी हैं। पढ़ने में मन नहीं लगता, अकेले में बैठकर रोती भी हैं। परीक्षा कक्ष में हाथ पैर ठंडे होने लगते हैं। इसी तरह तुलाराम बाग के 27 वर्षीय युवक ने बताया कि वह एसआई बनना चाहते हैं। तैयारी कर रहे हैं लेकिन तमाम असफलताओं के कारण बहुत डर चुके हैं। अब उनकी उम्र सीमा भी समाप्त हो रही है। कभी कभी लगता है कि भविष्य अंधकारमय हो चुका है। कहीं भाग जाएं, कुछ गलत कदम उठा लें।

परीक्षा से आगे भी जिंदगी है...

डा. कमलेश राय ने काउंसिलिंग के दौरान बताया कि अभिभावक अपनी उम्मीदों का बोझ बच्चों पर न डालें। जो लोग किसी परीक्षा में असफल हो रहे हैं वह भी घबराएं नहीं। परीक्षा की सफलता के आगे भी जिंदगी है। धैर्य रखें और आपने आसपास खुले मन से देखें और सोंचे। आत्मविश्वास बनाए रखें, चित्त को शांत रखना भी जरूरी है। यदि पढ़ाई में मन न लगे तो लिखकर कोशिश करें। थोड़ी देर योग और ध्यान का भी अभ्यास करें। कभी भी परीक्षा को आखिरी सत्य न मानें।

झुंझलाएं नहीं बच्चों को बार बार बताएं

मनोविज्ञानशाला की निदेशक ऊषा चंद्रा ने बताया कि बच्चे यदि कोई चीज सीख न पाएं तो बार बार बताएं, झुंझलाएं नहीं। उन्हें पूरा समय दें। दिनचर्या पर नजर रखें। अनुशासित जीवन का आदर्श प्रस्तुत करें। समय प्रबंधन कर बच्चों की दिनचर्या तय करें। घर में कलहपूर्ण माहौल न होने दें। समन्वय बनाकर रखें जिससे बच्चों पर दुष्प्रभाव न पड़े। यह दुष्प्रभाव मानसिक दिव्यांगता को बढ़ाता है। मनोरंज के लिए बच्चों को अच्छा साहित्य पढ़ने को दें। इनडोर आउटडोर खेल, चित्रबनाने, रंग भरने, बागवानी करने के लिए प्रेरित करें। आवश्यकता के अनुसार छोटी छोटी वस्तुओं को क्रय करना भी सिखाएं। पैसों का हिसाब किताब व अन्य व्यावहारिकता भी जरूर सिखाएं।

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