Women Special: अपने हौसले से बल्ब बनाने वाली कंपनियों को दे रहीं टक्कर सरिता और रामरती

नेवाड़ी गांव की रामरती देवी व सरिता पांडेय गरीब परिवार से थीं। परिवार का खर्च और बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी यह चिंता उनको खाए जा रही थी। गरीबी को मात देने के लिए यह महिलाएं साल भर पहले दुर्गा आजीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ गईं

Ankur TripathiThu, 28 Oct 2021 10:10 AM (IST)
ये महिलाएं अपने हौसले के दम पर बल्ब बनाने वाली कंपनियों को टक्कर दे रहीं हैं

प्रवीन कुमार यादव, प्रतापगढ़। ग्रामीण क्षेत्र की कुछ घरेलू महिलाएं अपने हौसले के दम पर बल्ब बनाने वाली कंपनियों को टक्कर दे रहीं हैं। यह महिलाएं अब तक जीवन में रहे अंधेरे को रोशनी में तब्दील कर रहीं हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन महिलाओं का पूरा सहयोग कर रहा है। एक ओर जहां महिलाओं की अच्छी खासी आय हो रही है, वहीं दूसरी ओर गांव की गरीब महिलाओं को रोजगार से जोड़ा जा रहा है।

एक बल्ब पर 44 रुपये खर्च और 80 रुपये में बिक्री

मानधाता ब्लाक के नेवाड़ी गांव की रामरती देवी व सरिता पांडेय गरीब परिवार से थीं। परिवार की माली हालत ठीक नहीं थी। घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी, यह चिंता उनको खाए जा रही थी। गरीबी को मात देने के लिए यह महिलाएं साल भर पहले दुर्गा आजीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ गईं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से एक सप्ताह का प्रशिक्षण लेने के बाद यह महिलाएं एलईडी बल्ब बनाने लगीं। यह महिलाएं दिल्ली से उपकरण मंगाकर उसे तैयार करती हैं। महिलाओं द्वारा तैयार एलईडी बल्ब की अधिक डिमांड कौशांबी, फतेहपुर, अमेठी, सुलतानपुर आदि जिलों में है। एक बल्ब बनाने में 44 रुपये का खर्च आता है जबकि इसकी बिक्री 80 से 85 रुपये में होती है। थोक में यह बल्ब 65 से 70 रुपये प्रति पीस के हिसाब से मिल रहा है। महिलाएं बल्ब के अलावा झूमर, नाइट लैंप आदि भी बना रहीं हैं। एनआरएलएम विभाग के ब्लाक मिशन प्रबंधक नफीस अहमद द्वारा प्रशिक्षित किए जाने के बाद अब गांव की अन्य महिलाएं भी बल्ब तैयार करने का कारोबार शुरू करने की तैयारी में हैं। डीसी एनआरएलएम डा. एनएन मिश्र ने बताया कि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़कर समूह की महिलाएं विकास की इबारत लिख रहीं हैं।

नेवाड़ी गांव बना हब

नेवाड़ी गांव में विकास कार्य का अभाव है। गांव के अधिकांश लोग खेती पर ही निर्भर हैं। खेती व मजदूरी से परिवार का खर्च चलता है। ऐसे में जब रामरती व सरिता ने बल्ब बनाने का काम शुरू किया तो गांव की कई और महिलाएं काम करने लगी। अब तो यह गांव हब के रूप में जाना जाने लगा है।

नई खेप हो रही तैयार

गांव में अभी भी काफी महिलाएं बेरोजगार हैं। पति की छोटी कमाई से परिवार का खर्च नहीं चल पा रहा है। ऐसे में गांव की 100 से अधिक महिलाओं को बल्ब बनाने का प्रशिक्षण देने की कवायद चल रही है। नवंबर माह से इन महिलाओं को गांव में ही प्रशिक्षण देने की तैयारी चल रही है।

परिवार के लोग कर रहे सहयोग

अभी तक मजदूर तबके के लोग गांव ही नहीं आसपास गांव में मजदूरी करने जाते थे। पूरे दिन मेहलत करने के बाद 250 से 300 रुपये मजदूरी मिलती थी। अब यह महिलाएं परिवार के लोगों से बल्ब बनाने में सहयोग ले रहीं हैं। इसके एवज में उनको प्रति बल्ब तैयार करने में कमीशन दिया जा रहा है।

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