इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मेस में छात्रों को नहीं मिलता भोजन

प्रयागराज : इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हॉस्टल छात्रों का पेट भरने में अक्षम हैं। स्थिति यह है कि यदि छात्र बाहर से टिफिन न मंगाए तो उन्हें भूखे रहना पड़े। हां, इन दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्ती के बाद चंद हॉस्टलों में मेस चालू करा दी गई हैं।
 विश्वविद्यालय के हॉस्टलों में मेस के संचालन का जिम्मा प्राइवेट लोगों के हाथ में है। बात तो सेंट्रलाइज्ड मेस की हुई थी लेकिन वह चालू नहीं हो सकी है। मेस में एक टाइम का खाना 30 से 40 रुपये में दिया जाना है। सबसे खराब व जर्जर स्थिति में है हिंदू हॉस्टल। यहां मेस का भवन खंडहर में तब्दील हो चुका है। इसमें ताला लटकता रहता है। इस मेस में छात्र आखिरी बार खाना कब खाए थे यह किसी को पता नहीं। इसी तरह ताराचंद, केपीयूसी, जीएन झा, एसआरके व पीसीबी हॉस्टल में नियमित मेस नहीं चलती। मुस्लिम हॉस्टल में भी मेस बंद है। यहां रहने वाले 100 से अधिक छात्र बाहर से टिफिन मंगाते हैं तब उनका पेट भर पाता है।
 छात्रों का कहना है कि भूखे पेट वे पढ़ाई कैसे करें। इविवि के चीफ प्रॉक्टर प्रो.रामसेवक दुबे का कहना है कि जिस हॉस्टल में मेस नहीं चल रही है, वहां एक दो दिन में व्यवस्था बहाल हो जाएगी। सभी हॉस्टलों में नियमित रूप से मेस का संचालन होगा। छात्र खुद खोजकर लाते हैं ठेकेदार पीसीबी हॉस्टल में एक ठेकेदार मेस का संचालन करता है।
  अब स्थिति यह है कि मेस की देखरेख करने वाला कोई नहीं है। मेस कब चालू होगी, यह ठेकेदार पर निर्भर करता है। यहां रहकर पढ़ने वाले आए दिन ठेकेदार खोज कर लाते हैं और एडवांस रुपये जमा करते हैं तो उन्हें खाना मिलता है। कई दिनों बाद यहां मेस चालू दिखी। चीफ प्रॉक्टर प्रो.रामसेवक दुबे भी यहां खाना खाने पहुंचे थे।

दिखा कोर्ट की सख्ती का असर
इविवि के हॉस्टलों में मंगलवार को हाईकोर्ट की सख्ती का असर दिखा। हॉलैंड हॉल, सर सुंदर लाल व पीसीबी हास्टल की मेस में गरमागरम खाना बन रहा था। कुछ छात्र टेबल पर बैठकर खाना भी खा रहे थे। सर सुंदरलाल हॉस्टल के अधीक्षक डॉ. संतोष सिंह खुद छात्रों के साथ बैठकर खाना खा रहे थे। पूरी जांच पड़ताल के बाद ही एंट्री कोर्ट के तेवर का ही असर रहा है कि मंगलवार को ताराचंद्र, एसएसएल, हॉलैंड हॉल समेत अन्य हॉस्टलों के गेट पर सुरक्षाकर्मी तैनात रहे। जो भी बाहरी लोग अंदर प्रवेश कर रहे थे उन्हें रोककर नाम, पता, मोबाइल, किससे मिलने जा रहे हैं, गाड़ी का नंबर नोट करने के बाद रजिस्टर में हस्ताक्षर भी कराया जा रहा था। यही स्थिति पहले हो जाती तो शायद पूर्व छात्र रोहित शुक्ला की हत्या न हुई होती।

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