साहित्य जगत को धीरेंद्र वर्मा समग्र की प्रतीक्षा, कथाकार दूधनाथ सिंह के निधन से रुका है प्रकाशन

दूधनाथ सिंह राजकमल प्रकाशन से 'धीरेंद्र वर्मा समग्र नामक ग्रंथावली प्रकाशित कराना चाहते थे

डॉ. धीरेंद्र के शिष्य दूधनाथ सिंह ने उनकी समग्र पुस्तकों की ग्रंथावली प्रकाशन कराने का निर्णय लिया। सालों मेहनत करके दूधनाथ ने समस्त कृतियों का संकलन व संपादन किया। समालोचक रविनंदन सिंह बताते हैं कि दूधनाथ सिंह राजकमल प्रकाशन से धीरेंद्र वर्मा समग्र नामक ग्रंथावली प्रकाशित कराना चाहते थे।

Ankur TripathiFri, 23 Apr 2021 07:00 AM (IST)

प्रयागराज, जेएनएन। प्रख्यात भाषा वैज्ञानिक, कुशल प्राध्यापक, व्यवस्थित आलोचक, कवि व संपादक रहे डॉ. धीरेंद्र वर्मा ने अपने जीवनकाल में अनेक रचनाएं की। हर रचना हिंदी साहित्य को दिशा देने वाली थी। यही कारण है कि डॉ. धीरेंद्र के शिष्य दूधनाथ सिंह ने उनकी समग्र पुस्तकों की ग्रंथावली प्रकाशन कराने का निर्णय लिया। सालों मेहनत करके दूधनाथ ने समस्त कृतियों का संकलन व संपादन किया। समालोचक रविनंदन सिंह बताते हैं कि दूधनाथ सिंह राजकमल प्रकाशन से 'धीरेंद्र वर्मा समग्र नामक ग्रंथावली प्रकाशित कराना चाहते थे। लेकिन, 12 जनवरी 2018 को उनकी मृत्यु होने से काम रुक गया। प्रकाशन की सामग्री दूधनाथ के बेटे अनिमेष के पास है, राजकमल प्रकाशन के प्रबंधन से उनकी बात लगभग तय हो गई। उम्मीद है कि जल्द प्रकाशन शुरू हो जाएगा।

बरेली में जन्मे और प्रयागराज में ली थी अंतिम सांस

17 मई 1897 को बरेली में जन्मे धीरेंद्र वर्मा की प्रारंभिक व माध्यमिक शिक्षा देहरादून तथा लखनऊ में हुई। उन्होंने 1914 में म्योर सेंट्रल कॉलेज  इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में प्रवेश लिया। उन्होंने 1921 में संस्कृत से एमए किया। इसके बाद पेरिस विश्वविद्यालय से भाषा वैज्ञानिक ज्यूल ब्लॉख के निर्देशन में फ्रेंच भाषा में ब्रजभाषा पर शोध प्रबंध लिखकर डी. लिट्. की उपाधि प्राप्त की। प्रयागराज में 23 अप्रैल 1973 को उन्होंने अंतिम सांस ली थी।

इविवि में रखी हिंदी  की नींव

डॉ. धीरेंद्र 1924 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रथम अध्यापक नियुक्त हुए। उन्होंने हिंदी विभाग की नींव रखी। उसी विभाग में उन्होंने प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष के पद को सुशोभित किया। रविनंदन सिंह बताते हैं कि इविवि में प्रथम हिंदी पाठ्यक्रम बनाने, उसे लागू करने तथा अध्यापन को नवीन गति प्रदान की का श्रेय डॉ. धीरेंद्र को जाता है। हिंदी पाठ्यक्रम के निर्धारण में जो काम श्यामसुंदर दास ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में किया था, वही काम डॉ. धीरेंद्र वर्मा ने इविवि में किया।

यह हैं प्रमुख कृतियां

डॉ. धीरेंद्र वर्मा की प्रमुख कृतियों में ब्रजभाषा व्याकरण, अष्टछाप, सूरसागर-सार, मेरी कालिज डायरी, मध्यदेश, ब्रजभाषा, हिंदी साहित्य कोश (संपादन), ग्रामीण हिंदी, कंपनी के पत्र (संपादन), हिंदी भाषा का इतिहास, हिंदी भाषा और लिपि, हिंदी साहित्य का इतिहास आदि शामिल है।

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