1989 में अशोक बाजपेई को पराजित कर श्‍यामाचरण गुप्‍त पहली बार चुने गए थे इलाहाबाद के महापौर

श्‍यामाचरण गुप्‍त को 1989 में पहली राजनीतिक सफलता मिली थी। अशोक वाजपेयी को हराकर वह इलाहाबाद के मेयर बने थे।

गैर कांग्रेसी दलों ने श्यामाचरण गुप्त का समर्थन किया और पहली बार उनको सफलता मिल गई। वह प्रयागराज (तब इलाहाबाद) के महापौर बन गए। इसके पहले वर्ष 1984 में वे बांदा संसदीय सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरे थे लेकिन पराजित हुए।

Brijesh SrivastavaSat, 10 Apr 2021 11:29 AM (IST)

प्रयागराज, जेएनएन। पूर्व सांसद श्यामाचरण गुप्त ने तो राजनीति की शुरुआत वर्ष 1984 में की थी, लेेकिन उनको सफलता सन् 1989 में मिली। उस समय वह महापौर पद के लिए चुनाव मैदान में उतरे थे। राह बेहद मुश्किल थी, क्योंकि सामने कांग्रेस से अशोक कुमार बाजपेई चुनाव मैदान में थे। उस समय शहर में 40 वार्ड थे। इन वार्डों में दो-दो सभासद चुने जाते थे। श्यामा चरण गुप्त ने चुनाव में जीत हासिल करने के लिए पूरा जोर लगा रखा था, वहीं सामने कांग्रेस के दिग्गज नेता अशोक कुमार बाजपेई ने भी पूरी रणनीति बना रखी थी।

1984 में बांदा संसदीय सीट से निर्दलीय प्रत्याशी थे

हालांकि गैर कांग्रेसी दलों ने श्यामाचरण गुप्त का समर्थन कर दिया और पहली बार उनको सफलता मिल गई। वह प्रयागराज (तब इलाहाबाद) के महापौर बन गए। इसके पहले वर्ष 1984 में वे बांदा संसदीय सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरे थे, लेकिन पराजय का सामना करना पड़ा था। हालांकि इस चुनाव में वह दूसरे नंबर पर थे।

2014 में भाजपा के सिंबल से प्रयागराज के सांसद बने थे

1991 में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर संसदीय चुनाव लड़े और हार गए। कुछ समय बाद वह समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के संपर्क में आए और फिर उनको पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया गया। वर्ष 2004 में वे बांदा संसदीय क्षेत्र से सपा के टिकट पर मैदान में उतरे और इस बार जीत दर्ज कर वे सांसद चुन लिए गए। वर्ष 2014 से पहले उन्होंने सपा छोड़ दी और भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा ने उन्हें वर्ष 2014 में प्रयागराज (तब इलाहाबाद) से संसदीय सीट से मैदान में उतारा। उनके सामने सपा के दिग्गज नेता रेवतीरमण सिंह थे, लेकिन श्यामाचरण गुप्त ने उनको पराजित कर दिया और यहां से सांसद चुने गए।

श्‍यामाचरण ने भाजपा छोड़ फिर सपा का थामा था दामन

पांच वर्ष के भीतर उन्होंने फिर भाजपा छोड़ दी और सपा में वापस आ गए थे। 2019 मे सपा के टिकट से बांदा से संसदीय चुनाव लड़े, लेकिन हार का सामना करना पड़ा। इसके अलावा वे कई बार चुनावी मैदान में उतरे, लेकिन जीत दर्ज नहीं कर सके थे।

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