रहस्य से भरा है प्रयागराज के हंडिया तहसील का साथर गांव, एक टीले का भी बना है अब तक राज

प्रयागराज का ग्रामीण इलाका प्राचीन काल में काफी समृद्ध रहा है। गंगा एवं यमुनापार में पुरानी सभ्यता दबी है।

प्रयागराज का ग्रामीण इलाका प्राचीन काल में काफी समृद्ध रहा है। गंगा एवं यमुनापार के इलाकों में पुरानी सभ्यता दबी हुई है। गंगापार के झूंसी में इलाहाबाद विश्वविद्याल के प्राचीन एवं पुरातत्व विभाग ने खुदाई करके लौहयुगीन सभ्यता के प्रमाण खोजे हैं।

Publish Date:Fri, 15 Jan 2021 01:00 PM (IST) Author: Ankur Tripathi

प्रयागराज, जेएनएन। प्रयागराज का ग्रामीण इलाका प्राचीन काल में काफी समृद्ध रहा है। गंगा एवं यमुनापार के इलाकों में पुरानी सभ्यता दबी हुई है। गंगापार के झूंसी में इलाहाबाद विश्वविद्याल के प्राचीन एवं पुरातत्व विभाग ने खुदाई करके लौहयुगीन सभ्यता के प्रमाण खोजे हैं। ऐसे ही हंडिया तहसील के साथर गांव में 50 बीघा में फैला एक उंचा टीला रहस्यों से भरा है। गांववासियों का मानना है कि इस टीले के अंदर किसी सभ्यता के अवशेष हैं। इसकी खुदाई होने पर प्राचीन सभ्यता का पता चलेगा।

सौ फुट ऊंचा है यह टीला

इतिहासकार प्रो.विमल चंद्र शुक्ल बताते हैं कि प्रयागराज मुगल एवं अंग्रेजों को बहुत रास आया था। गंगा एवं यमुना के साथ कई अन्य नदियों के यहां से गुजरने के कारण यह धरती बहुत उपजाऊ थी। यहां के तमाम गांवों के टीले रहस्यों को अपने में समेटे हुए हैं। हंडिया तहसील में फूलपुर से आठ मील पूर्व सराय ममरेज के निकट साथर गांव इनमें से एक है। इस गांव में एक बहुत लंबा चौड़ा पथरीला टीला है। यह टीला 50 बीघे में फैला हुआ है। टीले की ऊंचाई पृथ्वी से 100 फुट के ऊपर है। इसके निकट एक बहुत बड़ी झील है। बारिश में यह झील टीले को तीन ओर से घेर लेती है। गांव के लोग इस झील को भरो का कोट कहते हैं। प्रो.शुक्ला बताते हैं कि यह टीला देखने में किले का भग्नावशेष लगता है। प्राचीन काल में किलों की रक्षा की रक्षा के लिए प्राय: उसके आसपास जलाशय रहा करते थे। यह किसी न किसी रूप में अब तक यहां मौजूद है।

मुगलों से पहले रहा होगा किला

हिन्दुस्तान एकेडमी से प्रकाशित प्रयाग प्रदीप पुस्तक में शालिग्राम श्रीवास्तव ने भी साथर गांव का उल्लेख किया है। हालांकि यह किला किसने बनाया या किसका था उस पर वे प्रकाश नहीं डाल पाए। उन्होंने शोध के बाद लिखा है कि यह टीला जिसके नीचे किले के अवशेष हो सकते हैं मुगलकाल से पहले का है। यह गांव कब आबाद था इसका पता भी इतिहासकार नहीं लगा पाए हैं। इतिहासकारों को बड़ी खोज के बाद इस स्थान से तांबे के दो सिक्के मिले थे। प्रो.शुक्ला बताते हैं कि एक तांबे का सिक्का इतना खंडित है उसमें क्या लिखा है पढ़ा नहीं जा सकता है। दूसरा कुछ साफ है। इस सिक्के पर मुबारक शाह का नाम फारसी अक्षरों में अंकित है। मुबारक शाह जौनपुर का बादशाह था। उसका शासनकाल 1399 ई से 1401 तक रहा था। इसके अतिरिक्त इस स्थान पर अन्य कोई ऐतिहासिक सामग्री नहीं मिली है। पुरातत्ववेत्ताओं का मानना है कि यहां खोदाई की जाए तो बहुत कुछ मिलने की संभावना है।

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