top menutop menutop menu

अंग्रेजों से लोहा लेने वाले क्रांतिकारी मौलवी लियाकत अली व्यूह रचना में माहिर थे Prayagraj News

प्रयागराज, अमरदीप भट्ट। सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान संगमनगरी (पूर्ववर्ती इलाहाबाद) में क्रांति की मशाल महगांव (कौशांबी) निवासी मौलवी लियाकत अली ने बखूबी संभाली थी। आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने उन्हें ही यह जिम्मेदारी सौंपी थी। इसकी बड़ी वजह यह थी कि लियाकत अली व्यूह रचना के माहिर खिलाड़ी थे। खुसरोबाग से उन्होंने अंग्रेजों के समानांतर सरकार चलाई।

अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे

10 दिनों तक उनके साथी क्रांतिकारी तहसीलदार, नायब और कोतवाल की भूमिका में रहे। अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले लियाकत अली को उनके गांव वाले आज भी गर्व से याद करते हैं। महगांव निवासी मेहर अली खान के घर 17 जुलाई 1817 को घर जन्मे लियाकत अली के साथी क्रांतिकारियों की फौज में हिंदू और मुस्लिम दोनों थे। खुसरोबाग में बैठे-बैठे लियाकत ने शहर व आसपास के बड़े इलाकों में तहसीलदार, थानेदार और कोतवाल नियुक्त कर दिए। सैफुल्ला और सुखराम को चायल का तहसीलदार बनाया तो कासिम अली और नियामत अशरफ को कोतवाल।

ब्रिटिश सेना से जमकर मुकाबला किया

शिहाबुद्दीन को नायब और भारवा के जमींदार हादी तथा फैजुल्ला खां को सैनिक अधिकारी नियुक्त किया। चायल के अलावा फाफामऊ क्षेत्र में उनकी अधिक सक्रियता थी। क्रांति विफल हुई तो सैफुल्ला और सुखराम को क्रूर अंग्रेज अफसर कर्नल नील ने चौक स्थित नीम के पेड़ पर फांसी दे दी थी। बगावत की सजा मीर सलामत अली, लाल खां, हसन खां, दयाल, कल्लू, अमीरचंद्र, खुदा बख्श मिस्त्री, वजीर खां जैसे सहयोगियों को भी मिली। अंग्रेजों की आंख में धूल झोंक कर भागे थे। जब अंग्रेजों ने शहर पर कब्जा कर लिया और खुसरोबाग पर हमला किया तो लियाकत अली ने ब्रिटिश सेना से जमकर मुकाबला किया। हालांकि इसके बाद भी पराजय मिली तो लियाकत अंग्रेजों की आखों में धूल झोंक कर भाग निकले।

मौलवी के नाम से कांपते थे अंग्रेज

कुछ वर्षो बाद 14 साल बाद सितंबर 1871 में उन्हें सूरत में पकड़ लिया गया। मौलवी के नाम से कांपते थे अंग्रेज लियाकत अली खान के नाम की अंग्रेजों में कितनी दहशत थी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब उन्होंने इलाहाबाद की सदर तहसील पर कब्जा किया तब आधे से ज्यादा अंग्रेज भाग निकले थे। फिर भी कई अंग्रेज सैनिक और अफसर मारे गए थे। संरक्षित है जेल में पहने कपड़े मौलवी लियाकत अली का इंतकाल अंडमान की जेल में हुआ। इलाहाबाद संग्रहालय में उनके वह कपड़े संरक्षित हैं जो उन्होंने जेल में पहने थे। यहीं उनकी तलवार भी सुरक्षित है। क्षेत्रीय अभिलेखागार में उनसे संबंधित इतिहास के कुछ पन्ने के अलावा और कुछ नहीं है। महगांव निवासी आमिर काजी व मोहम्मद शमीम कहते हैं कि लियाकत अली की यादों को संजोना चाहिए ताकि नई पीढ़ी भी आजादी का मोल जाने।

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.