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आजादी का संघर्ष : मलाका जेल में कभी क्रांतिकारियों को दी जाती थी फांसी

गुरुदीप त्रिपाठी, प्रयागराज : स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल (एसआरएन) परिसर स्थित अंग्रेजों के जमाने की जेल मलाका जेल अब इतिहास बन गई है। इस ऐतिहासिक जेल के स्थान पर सुपर स्पेशियलिटी ब्लाक की स्थापना कराए जाने की भी बीच में माग उठी थी। यहा कभी क्रातिकारियों को फासी दी जाती थी।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग के प्रोफेसर योगेश्वर तिवारी बताते हैं कि मलाका जेल में क्रातिकारी ठाकुर रोशन सिंह की प्रस्तर की प्रतिमा आज भी मौजूद है। इसी जेल में उनको फासी दी गई थी। शाहजहापुर में जन्मे रोशन सिंह काकोरी काड के अभियुक्त थे। सन 1819 के आसपास बनी इस जेल में दो दर्जन से अधिक बैरक थीं। आजादी के बाद इसको सुधारगृह बना दिया गया। 1950 में सरकारी आदेश के बाद जेल को यहा से हटाकर नैनी स्थानातरित कर दिया गया। जेल हटने के बाद काफी दिनों तक यहा बंगला शरणार्थी रहे। इसके बाद यहा गवर्नमेंट प्रेस बन गया। कुछ समय बाद इसको रानी बोतिया ने खरीद लिया। उनकी मौत के बाद 1962 के आसपास यहा स्वरूपरनानी नेहरू अस्पताल बना। जेल के इस प्रमुख हिस्से (जिसके अवशेष आज भी मौजूद थे) को स्मारक बनाने के लिए छोड़ दिया गया। इस अवशेष में मलाका जेल के नाम पर चार बैरकें बची रह गई। क्रातिकारियों की याद दिलाने वाले स्थानों को विभिन्न कार्यो के लिए उपयोग में लाया जाने लगा। प्रो. तिवारी कहते हैं कि जेल में कई कुएं थे। जेल गेट के पास ही जेलर का बंगला हुआ करता था। जिन्हें फासी दी जाती थी, उन्हें छोटी छोटी कोठरियों में रखा जाता था। क्रातिकारियों को सीढि़यों में बाधकर मारा जाता था। शरीर के जख्मों पर नमक से भीगे कपड़ों से दबाया जाता था।

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