Prayagraj Magh Mela 2022: एक माह के कल्‍पवास का आरंभ 17 जनवरी को पौष पूर्णिमा स्नान पर्व से होगा

Prayagraj Magh Mela 2022 तीर्थराज प्रयाग में संगम तट पर एक महीने कल्पवास की परंपरा है। इसके लिए दो कालखंड तय हैं। कुछ कल्पवासी मकर संक्रांति से माघ शुक्ल पक्ष की संक्रांति तक कल्पवास करते हैं। पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक कल्पवास करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या अधिक है।

Brijesh SrivastavaFri, 26 Nov 2021 03:13 PM (IST)
प्रयागराज में गंगा-यमुना के तट पर आधी जनवरी बीतने के बाद माघ मेला लगेगा। कल्‍पवास 16 फरवरी तक होगा।

प्रयागराज, जागरण संवाददाता। प्रयागराज के माघ मेला की तैयारी है। साधना, समर्पण व संस्कार का संवाहक माघ मेला जनवरी 2022 में लगेगा। मोक्ष की कामना, मनोवांछित फल की प्राप्ति की संकल्पना साकार करने के लिए हजारों संत व श्रद्धालु सुख-सुविधाओं का त्याग करके संगम की रेती पर धूनी रमाएंगे। माघ मास में कल्पवास करके भजन-पूजन में लीन रहेंगे। कल्पवास अबकी 30 दिनों तक चलेगा।

16 फनवरी को माघ पूर्णिमा स्‍नान के साथ कल्‍पवास का होगा समापन

माघ मेला में कल्‍पवास का आरंभ 17 जनवरी पौष पूर्णिमा स्नान पर्व से होगा, जबकि समापन 16 फरवरी माघ पूर्णिमा स्नान पर्व पर होगा। बीते वर्ष 2021 में पौष पूर्णिमा 28 जनवरी और माघी पूर्णिमा 27 फरवरी को थी। इससे कल्पवास की अवधि बढ़ गई थी, क्योंकि काफी श्रद्धालु 14 जनवरी मकर संक्रांति से मेला क्षेत्र में पहुंच गए थे। उन्हें डेढ़ माह तक मेला क्षेत्र में रुकना पड़ा था, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है।

संगम तट पर एक माह के कल्‍पवास की परंपरा है

तीर्थराज प्रयाग में संगम तट पर एक महीने कल्पवास करने की परंपरा है। इसके लिए दो कालखंड तय है। कुछ कल्पवासी मकर संक्रांति से माघ शुक्ल पक्ष की संक्रांति तक कल्पवास करते हैं, परंतु पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक कल्पवास करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या अधिक होती है।

माघ मास 2022 का प्रमुख स्नान पर्व

-14/15 जनवरी : मकर संक्रांति

-17 जनवरी : पौष पूर्णिमा

-एक फरवरी : मौनी अमावस्या

-पांच फरवरी : वसंत पंचमी

-आठ फरवरी : अचला सप्तमी

-16 फरवरी : माघी पूर्णिमा

-एक मार्च : महाशिवरात्रि।

आचार्य विद्याकांत पांडेय ने बताया महात्‍म्‍य

पराशर ज्योतिष संस्थान के निदेशक आचार्य विद्याकांत पांडेय के अनुसार अधिकतर वर्षों में पौष पूर्णिमा 10 जनवरी के अंदर लगती रही है, जबकि मकर संक्रांति 14 अथवा 15 जनवरी को लगती है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मकर संक्रांति का पर्व पौष पूर्णिमा से पहले हो रहा है। ऐसी स्थिति में कल्पवास की स्थिति में बदलाव होता है। बताया कि कुछ संत महाशिवरात्रि तक मेला क्षेत्र में रुकते हैं, लेकिन उनकी संख्या कम होती है।

इस कारण होता है विलंब

आचार्य विद्याकांत पांडेय के अनुसार अधिकमास व क्षयाधि मास लगने पर समय में हेरफेर होता है। क्षयाधि मास में शुक्लपक्ष व कृष्णपक्ष का दिन कम हो जाता है, जबकि अधिकमास में दिन बढ़ जाते हैं। इसी कारण पौष पूर्णिमा देर से लगती है।

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