Pragatishil Lekhak Sangh: प्रलेस के बदले स्वरूप से प्रयागराज के रचनाकार हैं चिंतित

Progressive Lekhak Sangh कवि यश मालवीय कहते हैं कि प्रलेस बहुत दिनों से भटका हुआ है। वो अब ऐसे लेखकों की संस्था हो गयी है जो अपनी स्थापना के लिए व अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वहां अब स्वस्थ प्रतिस्पर्धा जैसी कोई चीज नहीं रह गयी है।

Brijesh SrivastavaFri, 30 Jul 2021 12:00 PM (IST)
प्रगतिशील लेखक संघ के सिद्धातों को लेकर आयोजित चौपाल में विद्वानों ने अपने विचार रखे।

प्रयागराज, जेएनएन। साहित्यिक संस्था गुफ्तगू प्रमुख मुद्दों पर गोष्ठियां व चर्चा करके साहित्य को दिशा देने का काम कर रही है। गुफ्तगू ने प्रलेस अर्थात प्रगतिशील लेखक संघ के सिद्धातों को लेकर चौपाल का आयोजन किया, जिसमें ख्यातिलब्ध रचनाकार शामिल हुए। चौपाल में शामिल प्रख्यात शायर मुनव्वर राना कहते हैं कि असल में प्रलेस उसी वक्त तक था, जब सरदार, कैफी, मजरूह आदि मौजूद थे। उनके बाद जो नई विचारधारा आई, एक तरह से सत्ता की बागडोर उनके हाथ में आ गई तो सब इधर-उधर तख्ती तो लगाए रहे प्रगतिशील की और जिसको जहां मौका मिला, अपना भेष बदलकर चला गया। 

प्रलेस ने हिंदी और उर्दू साहित्‍य को बहुत कुछ दिया है : मुनव्‍वर राना

मुनव्‍वर राना के अनुसार ऐसा कोई आदमी है भी नहीं, जिसकी सरदारी पर यह लेखक संघ चल सके, तो जाहिर सी बात है कि यह संगठन अपने उद्देश्य से भटक गया है। कहा कि बेसिक बात यह है कि प्रलेस ने उर्दू साहित्य हो या हिंदी साहित्य हो, दोनों को बहुत कुछ दिया था। उनकी जो इकाई थी- एकता, एक-दूसरे पर भरोसा करना तथा एक-दूसरे की मदद करना, उससे साहित्य को फायदा मिला था। हालांकि यह साहित्य की बदनसीबी होती है कि कोई भी संघ जिससे साहित्य को फायदा होने वाला होता है, वो बहुत दिनों तक चलता नहीं है। यही प्रलेस के साथ भी हुआ। जिन्होंने जमीन में बैठकर, टाट-पट्टी में बैठकर इसकी खिदमत की थी। उनमें से तो बहुत ऐसे थे, जिन्हेंं बहुत कुछ हासिल ही नहीं हुआ, कुछ खुशनसीब थे, जिन्हेंं बहुत कुछ मिला भी। उनके बाद जो ये प्रगतिशील वाले बिल्ले लगाये घूम रहे हैं, इनके पास बिल्ला ही है, प्रगति नहीं। बगैर बोले और बगैर बताए कि मैं प्रगतिशील हूं, हमें अपना काम करते रहना चाहिए। इसका फैसला तो 50 बरस बाद होना है। इसमें चीखने-चिल्लाने से कुछ नहीं हो सकता है। 

अब नहीं है स्वस्थ प्रतिस्पर्धा : कवि यश मालवीय

कवि यश मालवीय कहते हैं कि प्रलेस बहुत दिनों से भटका हुआ है। वो अब ऐसे लेखकों की संस्था हो गयी है, जो अपनी स्थापना के लिए व अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वहां अब स्वस्थ प्रतिस्पर्धा जैसी कोई चीज नहीं रह गयी है। प्रलेस का स्वर्णिम इतिहास रहा है, उसमें अमरकांत व अजित पुष्कल जैसे लोग रहे हैं। मौजूदा समय में इसमें अलेखक घुस आए हैं, जो लेखक हैं ही नहीं। वे या तो धनकुबेर हैं या ऐसे लोग हैं, जिनकी कोई विशेष पहचान नहीं है। यह केवल प्रलेस की ही बात नहीं, अधिकांश लेखक संगठनों की यही स्थिति है। 

बाले, आंदाेलन काफी समय से भटक गया है

यश मालवीय बोले कि मेरा मानना है कि लेखक प्रकृति से ही वामपंथी होता है। जहां भी असमानता है, विषमता है व ऊंच-नीच है वो वहां चोट करता है, लिखता है। तो ऐसी स्थिति में यह आवश्यक नहीं है कि हम किसी से शिष्यत्व लें या किसी संघ में सम्मिलित हों। यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो लेखक संघों ने साहित्य का नुकसान ही किया है। जन और वाम की बात करने वाले ये लोग ज्यादातर जनविरोधी हैं। ऐसे में यह आंदोलन भटक ही नहीं गया है, बल्कि लंबे समय से भटका हुआ है। प्रलेस भी हमारे वर्तमान समाज का आइना बनता जा रहा है। अब आवश्यकता इस बात की है कि नये लोग सामने आएं, जिनके लिए साहित्य ही प्रतिबद्धता हो। 

बदली है स्थिति : प्रो. राजेंद्र कुमार

वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. राजेंद्र कुमार का मत है कि यदि किसी को दिशा नहीं मिल पा रही है तो उसमें आरोप-प्रत्यारोप क्या लगाया जाए। जितने साथी हैं जो चिंतन करते हैं, उनका सोचना तो चलता है लेकिन व्यवहार में क्रियांवयन नहीं हो पाता है। परेशानी तब होती है जब व्यवहार और विचार साथ नहीं चलते हैं। इसे भटकाव कह लीजिए या कमजोरी कह लीजिए। यह कमजोरी तो सभी की है जो समाज को लेकर परेशान रहते हैं। आज कल क्या है कि जो नयी चीजें आ गयी हैं, जैसे-भूमंडलीकरण, बाजारवाद, उपभोक्तावाद आदि। अब गैरजरूरी चीजों को जरूरी बनाया जा रहा है। पुराने जमाने में प्रलेस ने पुरानी रूढिय़ों को तोडऩे की बात की थी और उन्हेंं तोड़ा भी। लेकिन इस बाजारवाद ने जो नयी रूढिय़ां बनाई हैं। अब उन नई रूढिय़ों को तोडऩे की हिम्मत की जाये, तब कुछ बात बने। अब तो बौद्धिकता भी फैशन बन गई है। उसका भी बाजार तैयार हो गया है। बौद्धिकता व विचारों को भी बाजार ने हथिया लिया है। इसको समझने की जरूरत है। 

प्रलेस भटका है यह कहना मुनासिब नहीं : प्रो. अली अहमद

उर्दू के रचनाकार प्रो. अली अहमद फातमी कहते हैं कि प्रलेस मूल उद्देश्यों सेे भटक गया है, यह कहना जरा भी मुनासिब नहीं है। देखिए कुछ गरम-गरम बातें हो जाती हैं, उन्हेंं डिस्कस भी किया जाता है। हां, यह जरूर है कि कभी-कभी कुछ मुद्दे ऐसे आ जाते हैं, जिन पर विरोध हो जाता है। यह तो साहित्यकारों व विचारकों में हो जाता है और किसी भी संगठन के विकास के लिये यह जरूरी भी है। हर आदमी को अपनी बात कहने का हक होता है। तो यह कहना कि प्रगतिशील लेखक संघ अपने उद्देश्यों से भटक गया है, मैं इससे सहमत नहीं हूं। चौपाल का संयोजन संस्थाध्यक्ष इम्तियाज अहमद गाजी ने किया।

 

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