जानिए प्रेमचंद और फिराक गोरखपुरी में कैसे हुई दोस्ती, किसके माध्यम से शुरू हुआ साहित्यिक सफर

रघुपति सहाय यानी फिराक गोरखपुरी का साहित्यिक सफरनामा काफी रोचक है।

साहित्यकार रविनंदन सिंह बताते हैं कि हिंदी लेखन के क्षेत्र में फिराक का दाखिला 1919 में प्रेमचंद ने ही कराया था। उस समय प्रेमचंद गोरखपुर के नॉर्मल स्कूल में अध्यापक के रूप में तैनात थे। गोरखपुर में फिराक का घर और प्रेमचंद का आवास आसपास था

Ankur TripathiWed, 03 Mar 2021 08:00 AM (IST)

प्रयागराज, जेएनएन। रघुपति सहाय यानी फिराक गोरखपुरी का साहित्यिक सफरनामा काफी रोचक है। यह बहुत बहुत कम लोग जानते हैं कि फिराक मूलत: हिंदी की नर्सरी में तैयार हुए थे। वे बाद में उर्दू की तरफ गए। उनको रचनाकार होने का वीजा हिंदी भाषा ने ही प्रदान किया था। जहां प्रेमचंद उर्दू से हिन्दी में आए थे, वहीं फिराक हिंदी से उर्दू के क्षेत्र में गए।

हिंदी लेखन में प्रेमचंद ने कराया था  दाखिला
साहित्यकार रविनंदन सिंह बताते हैं कि हिंदी लेखन के क्षेत्र में फिराक का दाखिला 1919 में प्रेमचंद ने ही कराया था। उस समय प्रेमचंद गोरखपुर के नॉर्मल स्कूल में अध्यापक के रूप में तैनात थे। गोरखपुर में फिराक का घर और प्रेमचंद का आवास आसपास था। तब फिराक रघुपति सहाय हुआ करते थे और 1918 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए पास विद्यार्थी के रूप में उनकी पहचान थी। प्रेमचंद के पड़ोस में रहने के कारण उनसे अकसर मुलाकात होती रहती थी। उसी समय प्रेमचंद ने उनकी प्रतिभा को पहचान लिया था और एक दिन उन्हेंं लेकर गोरखपुर से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्र 'स्वदेशÓ के संपादक दशरथ प्रसाद द्विवेदी से मिले।

'स्वदेश पत्रिका का  सहायक संपादक बनने पर शुरू हुई साहित्यिक यात्रा
रविनंदन बताते हैं कि दशरथ प्रसाद द्विवेदी ने प्रेमचंद की सिफारिश पर रघुपति सहाय को 'स्वदेश में सहायक संपादक नियुक्त कर लिया। 20 रुपए मासिक वेतन तय हुआ। यहीं से उनकी साहित्यिक यात्रा शुरू हुई। 'स्वदेश में ही उनकी मुलाकात उस समय के सुपरिचित लेखक मन्नन द्विवेदी 'गजपुरी से हुई। 'स्वदेश में फिराक के सार्वजनिक लेखन की शुरुआत अनुवाद से हुई। रघुपति सहाय अंग्रेजी कवि बायरन के प्रशंसक थे। उन्होंने बायरन की महाकाव्यात्मक कृति 'डॉनजुआन का 'दीर्घायुनीर शीर्षक से हिन्दी मे सुंदर अनुवाद किया। यह अनुवाद स्वदेश में धारावाहिक के रूप में चार भागों में प्रकाशित हुआ। अनुवाद का पहला अंश 15 सितम्बर 1919 को प्रकाशित हुआ। यही तिथि फिराक जैसे साहित्यकार के पैदाइश की तिथि है। 'डॉनजुआन का अंतिम अंश 22 दिसम्बर 1919 को प्रकाशित हुआ था। इसके बाद बाबू रघुपति सहाय ने 'स्वदेश के लिए बहुत कुछ लिखा।

हास्य व्यंग भी लिखा

रविनंदन बताते हैं कि 'स्वदेश में फिराक ने लेख, कहानियां, संस्मरण, आलोचना, फीचर आदि सब कुछ लिखा।  उन्होंने 'अज्ञात और 'लालबुझक्कड़ के छद्मनाम से हास्य-व्यंग्य भी लिखा। यहां तक कि संपादक द्विवेदी ने 'स्वदेश का संपादकीय दायित्व भी रघुपति सहाय को सौंप दिया।

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