भगवान राम की नैया पार लगाने वाले निषादों की डूब रही नाव, कश्ती बनाने का काम हो गया मंदा

भगवान राम को गंगा नदी पार उतारने वाले निषाद इस कोरोना काल में आज भुखमरी के कगार पर पहुंच चुके हैं। उनके लिए गुजारा करना मुश्किल होता जा रहा है। जब पेट भरना ही कठिन हो तो फिर बच्चों की शिक्षा कैसे दिला पाएंगे।

Ankur TripathiFri, 30 Jul 2021 04:02 PM (IST)
लकड़ी की कस्ती बनाने का काम चढ़ गया कोरोना महामारी की भेंट

प्रयागराज, जागरण संवाददाता। गंगा पार उतरने के बाद श्री राम जब निषादराज को उनका पारिश्रमिक देने की कोशिश करते हैं, तो वह मना कर देते हैं वह कहते हैं कि हम एक ही जाति के हैं। मल्लाह कभी मल्लाहों से मजदूरी नहीं लेते। आज आप मेरे घाट पर आए तो मैंने आपको पार उतारा है और जब मैं आपके घाट आऊं तो आप मुझे भवसागर से पार लगा देना। भक्त निषाद के यह विचार सुनकर राम हर्षित हो जाते हैं और निषाद को आशीर्वाद देकर आगे बढते हैं। जी हां कभी भगवान राम को गंगा नदी पार उतारने वाले निषाद इस कोरोना काल में आज भुखमरी के कगार पर पहुंच चुके हैं। उनके लिए गुजारा करना मुश्किल होता जा रहा है। जब पेट भरना ही कठिन हो तो फिर बच्चों की शिक्षा कैसे दिला पाएंगे।

कभी दूसरे जिलों तक होती थी कश्तियों की सप्लाई

जनपद में कुंडा के करेंटी गांव के 25 घर की मल्लाहों की बस्ती लकड़ी की कश्ती बनाने के लिए मशहूर हैं। लगभग तीन दशक से यहां के लोग लकड़ी की कश्ती बनाकर फतेहपुर, रायबरेली, प्रयागराज, कौशांबी, सहित आसपास के जिलों में बेचने का काम करते हैं। यहां की बनी नाव दूर-दूर तक मशहूर थी, जिसे लोग आर्डर देकर बनवाते थे। यही उनकी रोजी रोटी का साधन है, लेकिन कोरोना महामारी की काली नजर इन पर ऐसी पड़ी कि धीरे धीरे कश्तियों की बिक्री कम हो गई और इनका धंधा मंदा हो गया। करेंटी के राहुल निषाद, मुकेश निषाद, सोनू, विमलेश, राजेश, पप्पू निषाद बताते हैं कि कभी सालभर में दर्जनों कश्ती बेचने वाला इनका कुनबा आज एक एक कश्ती बेचने में मजबूर हो गया है। गंगा भी बढ़ गई हैं। मछली पकडऩे का काम भी बंद है। अब तो सिर्फ राहगीरों को नाव से गंगा के इस पार से उस पार उतारने पर जो पैसा मिलता है, उसी से घर का खर्च चलता है। अब देखना यह है कि कभी भगवान राम की नैया पार लगाने वाले इन निषादों की जीवन की नैया कौन पार लगाता है। अगर यही हाल रहा तो निषादों को अपना पारंपरिक पेशा छोड़कर दूसरे रोजगार की तरफ रूख करना पड़ेगा। परिवार का गुजारा करने के लिए यह उनकी मजबूरी बनती जा रही है।

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