जानिए, इकबाल नारायण गुर्टू ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय का कुलपति बनने के लिए क्या रखी थी शर्त

उस जमाने में कुलपति का चयन विश्वविद्यालय कोर्ट करती थी। लेकिन गुर्टू अपनी शर्त पर कुलपति बने थे।

प्रो.तिवारी बताते हैं कि इकबाल नारायण गुर्टू ने कुलपति बनने के लिए प्रचार नहीं किया था। उस समय विश्वविद्यालय कोर्ट कुलपति का चयन करती थी। गुर्टू ने प्रत्याशी बनने पर शर्त रखी कि वे ना तो अपना प्रचार करेंगे और ना अपना वोट खुद को देेंगे।

Rajneesh MishraFri, 26 Feb 2021 05:58 PM (IST)

प्रयागराज, जेएनएन। एक शताब्दी से अधिक पुराने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एक से एक महान हस्तियां कुलपति रहीं हैं। उस समय कुलपति बनने के लिए लोगों को राजनीतिक पहुंच का प्रयोग नहीं करना पड़ता था। ना ही कुलपति बनने पर वे अपने कुनबे को नौकरी दिलाने में जुट जाते थे। इनमें एक कुलपति थे पंडित इकबाल नारायण गुर्टू। इनकी कर्तव्‍यपरायणता, निष्ठा, निष्पक्षता की चर्चा आज भी होती है। उस जमाने में कुलपति का चयन विश्वविद्यालय कोर्ट करती थी। गुर्टू अपनी शर्त पर कुलपति बने थे।

स्वर्ण जयंती समारोह का किया था आयोजन
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गणित विभाग के अध्यक्ष रहे प्रो.माताम्बर तिवारी बताते हैं कि पंडित इंकबाल नारायण गुर्टू 1932 से 38 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति रहे थे। उन्हीं के समय 1937 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय का स्वर्ण जयंती समारोह मनाया गया था। समारोह में सर पीसी राय, सर मोहम्मद सुलेमान, सर सीवाई चिंतामणि, सर कैलाशनाथ हक्सर, भगवानदास तथा डॉ. गंगानाथ झा को डीलिट की मानद उपाधि दी गई थी। गुर्टू ने समारोह का संचालन खुद किया था।

बिना प्रचार के बन गए थे कुलपति
प्रो.तिवारी बताते हैं कि इकबाल नारायण गुर्टू ने कुलपति बनने के लिए प्रचार नहीं किया था। उस समय विश्वविद्यालय कोर्ट कुलपति का चयन करती थी। इसके लिए नामांकन करने वाले प्रत्याशी अपना प्रचार करते थे। गुर्टू ने प्रत्याशी बनने पर शर्त रखी कि वे ना तो अपना प्रचार करेंगे और ना अपना वोट खुद को देेंगे। इस कारण उनके समर्थकों को काफी परेशानी हुई थी। पर गुर्टू अपनी शर्ताें पर विजयी हुए।

चाय पर बुलाते थे शिक्षकों के ग्रुप को
प्रो.माताम्बर तिवारी बताते हैं कि इकबाल नारायण गुर्टू विश्वविद्यालय के शिक्षकों को छोटे-छोटे ग्रुपों में अपने घर पर चाय के लिए बुलाते थे। फिर उनकी राय मंगाते थे। उनकी कठिनाईयों को सुनते थे। छात्रों से मिलना ठीक समझते थे। छात्रों की परेशानियों को सुनकर उनका तत्काल निराकरण करते थे। वे कहते थे तुम मुझे अपने तर्कों से संतुष्ट कर दो मैं तुम्हारी बात मान लूंगा। वे स्वार्थ, दबाव तथा निजी संबंधों से प्रभावित होने वालों में से नहीं थे। उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय का आदर्श कुलपति माना जाता है।

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