आस्था की गंगा से फूट रही सेवा की धारा, Pratapgarh के वाराही धाम में सेवादार बने प्रवासी गुजराती

प्रतापगढ़ में रानीगंज तहसील क्षेत्र के परशुराम चौहरजन गांव में ऊंचे टीले पर है मां वाराही का दरबार

आयु की रक्षा करने के रूप में भक्तों के हृदय में बसने वाली मां के धाम में आप जाएंगे तो वहां कुछ वालंटियर आपको सेवा करते मिल जाएंगे। खासकर नवरात्र में तो वह दिन-रात सेवा में रमे रहते हैं। भक्तों की मदद करना उन्होंने अपना धर्म बना लिया है।

Ankur TripathiWed, 21 Apr 2021 07:00 AM (IST)

प्रयागराज, जेएनएन। यहां आस्था व भक्ति की गंगा में सब डुबकी लगाते हैं। मन को प्रसन्न करते हैं। यहां तो आस्था की गंगा से सेवा की धारा फूट पड़ी है जो अविरल बह रही है। भक्तों को मानवता, सेवा व संस्कारों की प्रेरणा भी दे रही है। यह सब हो रहा है प्रतापगढ़ में रानीगंज तहसील क्षेत्र के परशुराम चौहरजन गांव में ऊंचे टीले पर विराजीं मां वाराही के दरबार में। 

जगा रहे हैं जागरूकता व संस्कारों की अलख

आयु की रक्षा करने के रूप में भक्तों के हृदय में बसने वाली मां के धाम में आप जाएंगे तो वहां कुछ वालंटियर आपको सेवा करते मिल जाएंगे। खासकर नवरात्र में तो वह दिन-रात सेवा में रमे रहते हैं। भक्तों की मदद करना व उनकी हर मुश्किल को आसान करना उन्होंने अपना धर्म बना लिया है। यह सब इसी गांव-समाज के हैं और अरसे से गुजरात में बस गए हैं। गुजराती हो जाने के बाद भी अपनी जड़ को नहीं छोड़ा। मां वाराही सेवा समिति चैरिटेबल ट्रस्ट गुजरात बड़ोदरा के नाम से संगठन बनाकर सेवा का संकल्प पूरा किया जा रहा है। इसमें  वैसे तो कई भक्त हैं, पर मुख्य रूप से प्रेम शंकर, दादा भाई गिरि, भोला गिरि, धीरज गिरि, राज नारायन गिरि, मनीराम गिरि, सुरेंद्र गिरि, कृपा शंकर गिरि, विनोद गिरि हैं। साथ में कृपा शंकर गिरि, गिरजा शंकर, जयश्री गिरि, दिनेश, राम अक्षैवर गिरि सहित पूरा गिरि परिवार भक्तों की मदद में लगा रहता है। प्रेम शंकर व भोला गिरि की देखरेख में नवरात्र में भक्तों के लिए फ्री लंगर चलता है।

बुजुर्गों को मां के दरबार तक ले जाने में करते हैं मदद

यहां सेवादार महिलाओं, बीमारों, बुजुर्गों को मां के दरबार तक ले जाने में मदद करते हैं। प्रसाद वितरण भी करते हैं। इस साल इनका 18वां लंगर भंडारा चल रहा है। व्रत रखने वालों को फलाहारी देते हैं। हर नवरात्र में यह लोग घर आ जाते हैं। नौ दिन तक मां वाराही देवी के दरबार में समर्पित रहते हैं। यही नहीं इस बार तो कोरोना की वजह से परेशान लोगों को मास्क, सैनिटाइजर भी प्रदान किए गए। मां वाराही देवी इस बार स्वर्ण श्रृंगार भी इन प्रवासी गुजराती भक्तों ने कराया। यह धाम आल्हा-ऊदल से भी जुड़ा रहा है। उनका वह कुआं खंडहर के रूप में अब भी है। लोग उसे देखने जाते हैं। हालांकि पुरातत्व विभाग से उसका संरक्षण अब तक न हो पाना भक्तों को अखरता है।

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