हाई कोर्ट ने कहा- आश्रित कोटे में नियुक्ति अर्जी देने के बाद शादी की जानकारी न देना तथ्य छिपाना नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्‍वपूर्ण आदेश दिया है। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल तथा न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की खंडपीठ ने सहारनपुर की पूजा सिंह के पक्ष में एकलपीठ के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की विशेष अपील को खारिज करते हुए दिया है।

Brijesh SrivastavaSat, 27 Nov 2021 03:00 PM (IST)
कोर्ट ने कहा जिस समय याची ने आश्रित कोटे में नियुक्ति की अर्जी दी थी, उस समय वह अविवाहित थी।

प्रयागराज, जागरण संवाददाता। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवाहिता पुत्री को गलत जानकारी देने के आधार पर सेवा समाप्ति आदेश निरस्त करने के एकलपीठ के फैसले पर हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया है। राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ दाखिल विशेष अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि जिस समय याची ने आश्रित कोटे में नियुक्ति की अर्जी दी थी, उस समय वह अविवाहित थी। नियुक्ति में देरी के कारण बाद में शादी कर ली, यह नहीं कह सकते कि याची ने विवाहिता पुत्री होने के तथ्य को छिपाया है।

कोर्ट ने विवाहिता पुत्री को भी मृतक आश्रित परिवार में शामिल करने का फैसला किया है, उसे नियुक्ति पाने का अधिकार है। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल तथा न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की खंडपीठ ने सहारनपुर की पूजा सिंह के पक्ष में एकलपीठ के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की विशेष अपील को खारिज करते हुए दिया है।

विपक्षी की तरफ से अधिवक्ता ओम प्रकाश सिंह ने बहस की। याची के पिता स्वास्थ्य विभाग में श्रम निरीक्षक थे। सेवाकाल में उनकी मौत हो गई, याची उस समय नाबालिग थी। बालिग होने पर आश्रित कोटे में नियुक्ति की अर्जी दी। नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने में छह वर्ष लग गए। इस दौरान याची की शादी हो गई। 4 नवंबर 2006 को उप श्रमायुक्त पद पर नियुक्ति की गई। 15 वर्ष की सेवा के बाद यह कहते हुए नियुक्ति निरस्त कर दिया गया कि याची विवाहिता पुत्री होने का तथ्य छिपा कर नियुक्ति प्राप्त की है। कोर्ट ने कहा कि जब याची ने अर्जी दी थी तब वह विवाहित पुत्री नहीं थी। नियुक्ति देने के समय तक विवाहित हो चुकी थी। यह नहीं कह सकते कि याची ने तथ्य छिपाया है।

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