Chandrashekhar Azad Park: आइए प्रयागराज में मेरे पास ​​​​...मैं गवाह हूं अपने वीर सपूत की दिलेरी और बलिदान का

मेरी उम्र करीब 150 साल। मुझे प्रदेश का सबसे बड़ा पार्क होने का गौरव हासिल है। इससे बड़ा तमगा मुझे तब मिला जब मेरी पहचान अमर शहीद चंद्रेशखर आजाद पार्क के रूप में स्थापित हुई। दुख इस बात का कि मैंने देश के वीर सपूत आजाद की शहादत देखी है।

Ankur TripathiWed, 21 Jul 2021 07:00 AM (IST)
यह बलिदानी अतीत की थाती भी संवारे हुए है और देश के लिए मर मिटने की प्रेरणा देता है

प्रयागराज, जागरण संवाददाता। आजाद और प्रयाग श्रृंखला की दूसरी कड़ी में पढि़ए उस पार्क की दास्तान जो कहलाता है चंद्रशेखर आजाद पार्क। इसके कई नाम रहे हैैं अतीत में। यह बलिदानी अतीत की थाती भी संवारे हुए है और देश के लिए मर मिटने की प्रेरणा देता है। शहर के हृदय स्थल में फैली हरियाली यदि आंखों को सुकून देती है तो इससे जुड़ा इतिहास हमेशा रोमांचित करता है। इसकी भावनाओं की प्रस्तुति अमलेंदु त्रिपाठी की कलम से....

गर्व है मुझे अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद पार्क नाम मिलने का

मेरी उम्र करीब 150 साल। मेरा फैलाव 133 एकड़ में है। मुझे प्रदेश का सबसे बड़ा पार्क होने का गौरव हासिल है। इससे बड़ा तमगा मुझे तब मिला जब मेरी पहचान अमर शहीद चंद्रेशखर आजाद पार्क के रूप में स्थापित हुई।

दुख इस बात का है कि मैंने देश के वीर सपूत 'आजाद की शहादत देखी है। हां, मैं गवाह हूं उस वीर सपूत की दिलेरी का। वह 27 फरवरी 1931 की सुबह थी। साइकिल से चंद्रशेखर आजाद अल्फ्रेड पार्क आए और साथी सुखदेव से गंभीर मंत्रणा कर रहे थे। किसी ने मुखबिरी कर दी। चारों तरफ से गोरों की पुलिस ने घेर लिया। डीवाइएसपी विश्वेश्वर सिंह और तत्कालीन एसएसपी जान नॉट बोवर आ धमके। खतरे को आजाद ने भांप लिया तुरंत मोर्चा संभालते हुए साथी सुखदेव को कवर फायर देकर वहां से निकल जाने के लिए कहा। इसी बीच आजादी के उस दीवाने को पैर में गोली लग गई। सुखदेव जाना नहीं चाहते थे। कहा, ऐसे हाल में वह उन्हें छोड़कर नहीं जाएंगे, लेकिन आजाद ने एक न सुनी। विश्वास दिलाया कि फिरंगियों को झांसा देकर वह निकल आएंगे। सुखदेव वहां से भागकर इंडियन प्रेस पहुंचे। बताया कि पुलिस पीछे लगी है तो प्रेस के लोगों ने उन्हें बैठने के लिए कहा। रजिस्टर में गेट से एंट्री का समय सुबह सात बजे दिखा दिया गया ताकि पुलिस किसी तरह का आरोप न लगा सके। इधर आजाद ने पुलिस से मोर्चा लेने के लिए अपनी पिस्तौल जिसे वह बम्तुल बुखारा कहते थे, का मुंह खोल दिया। निकली गोली ने एसएसपी जान नॉट बोवर की दाहिनी कलाई और डीवाइएसपी विश्वेश्वर सिंह का जबड़ा चीर दिया। तब तक पुलिस ने पूरे पार्क को घेर लिया था, लेकिन वीर सपूत ने हौसला नहीं छोड़ा। जामुन के पेड़ की आड़ लेकर गोली चलाते रहे। अंत में सिर्फ एक गोली बची और उन्हें याद आ गया अपना वह संकल्प और दावा जिसमें कहा था मैं आजाद था, आजाद हूं और आजाद रहूंगा। अंग्रेजों के हाथ नहीं लगूंगा आजाद ही मरूंगा। बस आखिरी गोली अपनी कनपटी पर दाग ली और चिर निद्रा में सो गए। फिरंगियों की पुलिस फिर भी उनके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। मृत शरीर पर गोलियां चलाईं। करीब आधे घंटे बाद पहुंची। यह क्षण मेरे लिए बहुत भारी थे। उसके बाद बहुत लोग जुटे। खैर मैैं अल्फ्रेड पार्क से कंपनी बाग और फिर मोतीलाल नेहरू पार्क होते हुए चंद्रशेखर आजाद पार्क कहलाने लगा।

सक्स-कोबर्ग के राजकुमार अल्फ्रेड की स्मृति में बना था पार्क

वर्ष 1870 में सक्स-कोबर्ग के राजकुमार अल्फ्रेड एवं गोथा के प्रयागराज (पूर्ववर्ती इलाहाबाद) आने की स्मृति में अल्फ्रेड पार्क बनाया गया। यह पूरी तरह से फिरंगियों के प्रभाव क्षेत्र वाला स्थान था। शाम पांच बजे के बाद आम जनमानस इस तरफ नहीं आते थे। यहां देर रात तक अंग्रेज पार्टी करते। गीत संगीत का माहौल रहता। बैंड पार्टी व पुलिस की पूरी कंपनी यहां ठहरती थी। यही वजह है कि यह कंपनी बाग भी कहलाता रहा।

पार्क में है विक्टोरिया मेमोरियल

133 एकड़ में फैले इस पार्क में विक्टोरिया मेमोरियल भी बनाया गया है। यह सफेद संगमरमर से निर्मित है। इसकी चमक आज भी धूमिल नहीं हुई है। यहीं पर अष्टकोणीय बैंड स्टैंड भी है। इतालवी संगमरमर की बनी स्मारिका के नीचे ही महारानी विक्टोरिया की प्रतिमा हुआ करती थी, जिसे 1957 में हटा दिया गया।

गाथिक शैली में बनी है पब्लिक लाइब्रेरी

पार्क में ही गाथिक शैली में एक और भवन है जो पब्लिक लाइब्रेरी कहलाता है। यहां ब्रिटिश युग के महत्वपूर्ण दस्तावेज संरक्षित हैं। नार्थ वेस्टर्न प्राविंसेज एंड अवध लेजिस्लेटिव कौंसिल की पहली बैठक आठ जनवरी 1887 को यहीं हुई थी। इसके बगल में 1931 में इलाहाबाद महापालिका की ओर से स्थापित संग्रहालय है। पं. जवाहरलाल नेहरू ने इसे 1948 में अपनी तमाम वस्तुएं भेंट की थी।

संरक्षित है आजाद की पिस्टल

चंद्रशेखर आजाद पार्क परिसर में स्थापित संग्रहालय में तमाम चीजें संरक्षित हैं। इन्हें देखकर स्वतंत्रता आंदोलन की यादें ताजा हो जाती हैं। यहीं पर आजाद की वह नामी पिस्तौल भी रखी है जिससे उन्होंने बलिदान दिया। यह तमाम आगंतुकों के लिए आकर्षण का केंद्र होती है। आजाद ने पिस्तौल 1906 से 1931 तक प्रयोग की।

निर्माणाधीन है आजाद गैलरी

संग्रहालय में आजाद गैलरी भी स्थापित की जा रही है। राजभवन की मंजूरी के बाद काम चल रहा है। इस गैलरी में बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से संबंधित चीजें रखने के साथ ही गुमनाम आजादी के दीवानों से जुड़ी जानकारी होगी। अभी डाटा बेस बनाया जा रहा है। कुछ चीजें आवाज से बताई जाएंगी, कुछ चित्र से। यानी आडियो और वीडियो दोनों तरीके से। मुख्य घटनाओं को चलचित्र के जरिए समझाया जाएगा।

महत्वपूर्ण तथ्य

- भेष बदलने में माहिर चंद्रशेखर आजाद के चार नाम थे, पहला बलराज, दूसरा ब्रह्मचारी, तीसरा हरिशंकर, चौथा क्विक सिलवर

- कोड में बात होती तो आजाद को नंबर दो कहते और नंबर एक का अर्थ था कुंदन लाल

- आजाद ही ऐसे क्रांतिकारी थे जो सात साल तक अंग्रेजों की पहुंच से दूर रहे, अन्य अधिकतम तीन साल में पकड़ लिए गए

लोग बोले----

आजाद पार्क आने पर अलग ही भाव जगता है। जोश और जुनून तारी हो जाता है। मातृभूमि के लिए कुछ कर गुजरने की चाहत प्रबल हो जाती है। यूं कहिए सपने बड़े रूप ले लेते हैं।

- अवनीश सिंह चंदेल, छात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय

यहां आने वालों को जंगे आजादी के किस्से बताते हैं तो मन उत्साह से भर जाता है। नई पीढ़ी महापुरुषों व वीर सपूतों के बारे में जानने में विशेष रुचि लेती है तो खुद को भी अच्छा लगता है।

- सुनील शुक्ल, संग्रहालय गाइड

संग्रहालय में इसलिए आए हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी चीजों को देख सकें। बलिदानियों के बारे में जान सकें। बिना अपने महापुरुषों को जाने हम गौरव की अनुभूति नहीं कर सकते।

-रूपा सिंह, सोरांव

चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह की तरह हम भी देश के लिए कुछ करना चाहते हैं। हमारी किताबों में यदि इन महापुरुषों को शामिल कर लिया जाए तो अच्छा होगा।

- काजल पटेल, फाफामऊ

संग्रहालय में 23 जुलाई को प्रदर्शनी

इलाहाबाद संग्रहालय अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की 115 वीं जन्मतिथि पर 23 जुलाई को क्रांतिकारियों के 55 रेखाचित्रों की प्रदर्शनी लगाने जा रहा है। इसकी शुरुआत अपराह्न 3.00 बजे होगा। निदेशक डॉ. सुनील गुप्ता ने बताया कि आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत एक माह तक चलने वाली इस प्रदर्शनी के रेखाचित्रों को प्रयागराज के ही जयंत घोष ने बनाकर संग्रहालय को भेंट किया है।

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